भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 383

एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३५१ अनुवाद—कुसुमसे भी मनोहर सुकुमार देह श्रीराधे ! कुसुम-समूहसे सुसज्जित पवित्र केलि-वास-भवनमें तुम प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो। पद्यानुवाद— तरल हार धर विलस उरज पर— विविध सुमनसे सजे भवनमें चल राधा! पिय-ढिग उपवनमें। बालबोधिनी—सखी कहती है—तुम्हारा शरीर फूलोंसे भी अति सुकुमार है और यह पूराका पूरा केलिमण्डप चयन किये गये फूलोंसे रचा गया है और उन फूलोंकी चमकसे उद्दीप्त हो रहा है, अतएव इस पवित्र शयनगृहमें जाओ और श्रीकृष्णके साथ आमोद करो। चलो, निर्भय प्रवेश करो, यह तुम्हारा ही घर है। मृदुचल-मलय-पवन-सुरभि-शीते। विलस मदन-शर-निकर-भीते ॥ प्रविश.... ॥४॥ विलस रसलविलसितगीते—यह पाठ भी मिलता है। अन्वय—[अथ उद्दीपनाय अतिशयेन केलिसदनमेव वर्णयति]—रति-वलित-ललित-गीते (रतौ वलितं रतियोग्यं ललितं मनोहरं गीतं यस्याम् अयि तादृशि) राधे चल-मलयवन-पवन-सुरभि-शीते (चलेन मलयवन-पवनेन सुरभि च तत् शीतं शीतलञ्च यत् तस्मिन्) इह (केलिसदने) माधवसमीपं प्रविश [ततश्च] विलस (विहर) ॥४॥ अनुवाद—मदनके बाण-समूहसे भयभीत राधे ! तुम रतिरस सम्बन्धीय सुललित गीत गा रही हो, तुम कोमल तथा चञ्चल मलय-पवनसे प्रवाहित सुरभित तथा सुशीतल लता-केलि-गृहमें प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो।