भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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३५० श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[नहि मे मनः उच्छलितम् अस्य तव नागरस्य वैकल्यमाकलय्य मद्भवदनं हसतीति चेत् तत्राह]—कुच-कलस- तरल-हारे (कुचकलसयोः स्तनकुम्भयोः तरलः कम्पवशात् चञ्चलः हारः यस्याः, अयि तादृशि) [राधे] [कुचकलसकम्पेन अन्तर्वृत्तिर्व्यक्ता अतो वाम्यं न युक्तमितिभावः] नव-भवदशोक- दल-शयनसारे [नवभवद्भिः तरुणैः अशोकदलै रचितं शयनसारं शयनश्रेष्ठं यत्र तादृशे) इह [केलिसदने] माधव-समीपं प्रविश [ततश्च] विलस (विहर) ॥२॥ पद्यानुवाद— नवल अशोक-दलोंकी मृदुतर, शैया झलक रही है मनहर। अनुवाद—प्रिय समागम सूचक कम्पनमय कुचकलशोंमें विराजित चञ्चल हारवाली राधे! नूतनोद्भव अशोक-पत्रोंमें विरचित शय्यापर तुम प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो। बालबोधिनी—सखी कहती है—कलश सरीखे स्तनोंपर चञ्चल मुक्ताहार धारण करनेवाली राधे! तुम्हारा यह चञ्चल हार संकेत कर रहा है कि तुम भी रतिचपल हो। तुम्हारे लिए यह किसलय शय्या नवीन अशोक पत्तोंसे रचाई गई है। जाओ, इस सुसज्जित शय्या पर विलसो। कुसुमचय-रचित-शुचि-वासगेहे। विलस कुसुम-सुकुमार-देहे॥ प्रविश....॥३॥ अन्वय—अयि कुसुम-सुकुमार-देहे (कुसुमेभ्योऽपि सुकुमारः कोमलः देहः यस्याः तादृशि) राधे कुसुमचय-रचित-शुचिवास-गेहे (कुसुमचयेन पुष्पसमूहेन रचितं शुचेः शृङ्गारस्य वासगेहं यत्र तस्मिन्; निकुञ्जस्याभ्यन्तरे पुष्पगृहरचनाविशेष इति न पौनरुक्त्यम्) इह (केलिसदने) माधवसमीपं प्रविश [ततश्च] विलस (विहर)। [निकुञ्जगृहद्वारगतः प्रियस्त्वां प्रतीक्षते; अतो वाम्यं न युक्तमितिभावः] ॥३॥