गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३४९ गीतम् ॥२१॥ वराडीरागरूपकतालाभ्यां गीयते। मञ्जुतर-कुञ्जतल-केलिसदने। विलस रतिरभसहसितवदने! ॥१॥ प्रविश राधे! माधवसमीपमिह।ध्रुवपदम्। अन्वय—रति-रभस-हसित-वदने (रतिरभसेन सुरतोत्साहेन हसितं सहास्यं वदनं यस्याः, अयि तादृशि; तव उच्छलितं मनः अत्युत्सुकतया हास्यमिषेण प्रियमिलनाय बहिर्निर्गतमितिभावः) अयि राधे, इह मञ्जुतर-कुञ्जतल-केलिसदने (मञ्जुतरम् अतिमनोहरं कुञ्जतलं कुञ्जाभ्यन्तरमेव केलिसदनं तत्र) माधव-समीपं प्रविश [ततः] विलस (विहर) ॥१॥ अनुवाद—हे राधे! तुम्हारा वदन रतिजन्य उत्साहसे अतिशय रसके साथ उत्फुल्लित हो रहा है, तुम इस मनोहर निकुञ्जके केलिगृहमें प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो। पद्यानुवाद— चल राधा! प्रिय ढिग उपवनमें— मंजु कुंजतल अति मनभावन। विहँस विलस रति केलि-सदनमें चल राधा! पिय-ढिग उपवनमें॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधासे कहती है—रतिक्रीड़ाके उत्साहसे प्रसन्नमुखवाली हे राधिके! अब तो प्रेमके आवेगमें तुम मुस्कराकर हर्षित हो रही हो, इस मनोहर झुरमुटके बीचमें ही केलिगृह बना हुआ है, उसी क्रीड़ागृहमें जाइए और माधवके समीप जाकर उनके साथ रमण कीजिए। नव-भवदशोक-दल-शयन-सारे विलस कुचकलशतरल हारे! प्रविश.... ॥२॥