गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 380, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ें३४८ श्रीगीतगोविन्दम् हारावली-तरल-काञ्चन-काञ्चि-दाम मञ्जीर-कङ्कण-मणि-द्युति-दीपितस्य। द्वारे निकुञ्ज-निलयस्य हरिं विलोक्य व्रीडावतीमथ सखीमियमित्यवाच ॥४॥ अन्वय—अथ इयं (सखी) हारावली-तरल-काञ्चन- काञ्चिदाम-मञ्जीर-कङ्कण-मणिद्युति-दीपितस्य (हारावल्याः तरलानां मध्यगानां मणीनां) (धुकधुकी इति भाषा) तथा काञ्चन-काञ्चिदाम्नोः मञ्जीरयोः कञ्चणयोश्च मणीनां राधा- परिहितानामिति शेषः द्युतिभिः किरणैः दीपितस्य (प्रोज्ज्वलीकृतस्य) निकुञ्ज-निलयस्य (लतागृहस्य) द्वारे [अत्युत्सुकं] हरिं विलोक्य व्रीड़ावर्ती (रन्तु मुद्यतामपि लज्जया तत्पार्श्वमभजमानां) सखीम् (राधाम्) इति (वक्ष्यमाणं वचनं) निजगाद ॥४॥ अनुवाद—हारोंके मध्यमें विराजित धुकधुकी (मणि) से सुवर्णमयी काञ्ची (करधनी) से कुण्डलों तथा कंकणोंमें संलग्ना मणियोंकी कान्तिसे निकुञ्जवन समुद्भासित हो गया, वहाँ केलिगृह द्वार पर विद्यमान श्रीहरिको देखकर श्रीराधा लज्जावती हो गई, तभी सखी श्रीराधासे कहने लगी— बालबोधिनी—लजायी-सी श्रीराधा सखीके प्रोत्साहित करने पर जब निकुंज गृहमैं पहुँचती है तो श्रीहरिको वहाँ विद्यमान देखकर और भी लज्जित हो जाती है। निकुञ्ज द्वार उनके आभूषणकी कान्तिसे उनके मुक्ताहारकी उज्ज्वलतासे, उनकी सोनेकी करधनीकी दीप्तिसे, उनके पुखराज और कानकी मणियोंकी द्युतिसे दीपित हो उठता है। उसी आलोकमें उसे प्रतीक्षारत श्रीकृष्ण दीख जाते हैं—देखते ही लाजसे भर जाती है। उचित ही तो है कामवती युवतियोंके प्रथम सङ्गममें लज्जा किसी कामातिशयताका ही विधान करती है। अब सखि उन्हें आगे पैर रखनेके लिए अनुरोध करती है। प्रस्तुत पदमें वसन्ततिलका छंद है।