भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३४७ अन्वय—[किञ्च प्रेमपरीक्षण-कारणमप्येतदेवेत्याह]—एतत् तमाल-दल-नीलतमं (तमालदलवत् नीलतमम् अतिनीलम्; एतेन अन्धकारस्य निविड़ता प्रतिपादिता तमालवन-विहारश्च) तमिस्रं (तिमिरं) काश्मीर-गौर-वपुषाम् (काश्मीरं कुङ्कुमं; काश्मीरगौरवत् गौरं वपुः शरीरं यासां तासाम्) अभिसारिकाणां (कान्तसङ्केतं गच्छन्तीनां नारीणां) रुचिमञ्जरीभिः (लावण्यकिरणैः) अभितः (सर्वतः) आवद्धरेखं (संलग्नरेखं सत्) तत्प्रेम-हेम- निकषोपलतां (तासां प्रेम एव हेम काञ्चनं तस्य निकषोपलतां परीक्षापाषाणतां कष्टि पाथर इति भाषा) तनोति (विस्तारयति; तद्वत् शोभते) [यथा निकष-पाषाणे सुवर्णशुद्धि-जिज्ञासा, तथा तासां घनान्धकारे निःसाध्वसतया गमनेऽपि जिज्ञासा इति भावः] ॥३॥ अनुवाद—निकुञ्जमें सर्वत्र प्रसरित तमाल वृक्षके पत्र सदृश नीलतम, यह निविड़ अन्धकार कुङ्कुमकी भाँति सुवर्ण-वर्णा गौर देहमयी अभिसारिका नायिकाओंके रमणीय आलोकरूपी मञ्जरीके रूपमें इस प्रकार प्रतीयमान हो रहा है, मानो श्रीकृष्णके प्रेम रूप स्वर्णकी निकष (पाषाण) हो। बालबोधिनी—सखी कह रही हैं—हे प्रिये ! केसरकी कांतिके समान शरीरवाली अभिसारिकाओंके लिए मणिमञ्जरियोंसे चारों ओर रेखांकित हो तमालपत्रोंके समान अत्यन्त नीला यह अन्धकार प्रेमरूपी स्वर्णकी कसौटी है। यह अन्धकार कसौटीका प्रस्तर बन स्वयंको प्रस्तुत कर रहा है। इसी अन्धकार निकषपर सुन्दरियोंका इन केसरदल सरीखी रमणी-बालाओंके प्रेमका सोना परखा जायेगा। सोनेका रंग ही कसौटी पर परखा जाता है। कसौटीका रंग सोनेपर नहीं चढ़ता। श्रीराधा तुम और यह अन्धकार मानो सुवर्णपट्टिकाके ऊपर नीली-नीली कसौटी है न कि प्रेम स्वर्णके ऊपर कसौटी—अब शीघ्र अति शीघ्र अभिसरण स्थलपर चलो। प्रस्तुत पदमें उपमा अलंकार तथा वसन्ततिलका छंद है।