भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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३४६ श्रीगीतगोविन्दम् सिमट गया हो। कितनी उत्कण्ठा है उन्हें, कितनी आकुलता है और कितनी बेबसी, अब विलम्ब मत करो। रात्रिकालमें अभिसारिकाओंके लिए अंधकार उत्तम नीले वस्त्रोंके प्रिय मिलन हेतु हलन-चलन-गमनको कोई भी तो नहीं जान पाता। नील वर्णवत् यह अंधकार भी नील वर्ण होनेके कारण अभिसारिकाओंको अति प्रिय होता है। यह अंधकार ही धूर्त नायकोंके साथ अभिसारकी तथा रमणकी इच्छा रखनेवाली नायिकाओंका चारों ओरसे आलिङ्गन करता है, निकुंजोंमें धूर्तोंके साथ रमणकी महा उत्कण्ठा उद्भूत कर देता है। यही अंधकार उन अभिसारिकाओंका अञ्जन है। कानोंमें कृष्णवर्णका मयूर-पिच्छ-पुच्छ कर्णाभिराम है और तमालपत्रका काम भी यही करता है। उन नायिकाओंके हृदयोंमें नील कमलोंका हार है और कुचोंपर कस्तूरीके रसकी चित्र-रचना है। इस प्रकार यह नील वर्णका अंधकार आपके प्रत्येक अंगका आलिङ्गन करते हुए आपको अलंकरण प्रदान कर अलंकृत कर रहा है। अतः संकेत स्थलके उपयुक्त आभूषणोंको धारण कर गाढ़ अंधकारमें ही आप चलें, विलम्ब न करें। हर एक मुरमुटमें अत्यन्त चतुर रसिकोंके अभिसारके लिए पूरा वातावरण अनुकूल है। यह रात ही नील वसन है अपने निस्सीम विस्तारमें अंग-अंगको लपेटी सी है। चलो-शीघ्र चलो। कहीं विपक्ष आदिकी अन्य अभिसारका वहाँ अभिसार न करले उससे पूर्व ही तुम्हें वहाँ उपस्थित हो जाना चाहिए। इस समय नेत्रोंमें काजल; कानोंमें कर्णभूषण, गलेमें हार, कुचोंपर कस्तूरीपत्र-भङ्ग रचना आदिकी आवश्यकता नहीं। शीघ्र चलो॥२॥ काश्मीर-गौर-वपुषामभिसारिकाणा- माबद्ध-रेखमभितो रुचिमञ्जरीभिः। एतत्तमालदल-नील-तमं तमिस्रं तत्प्रेम-हेम-निकषोपलतां तनोति॥३॥