भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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एकादशः सर्गः - सामोद-दामोदरः ३५३ बालबोधिनी - सखी कहती है - राधे! तुम्हारी जाँघें आलस्ययुक्त एवं स्थूल हैं और यह निकुंज भी अति विस्तृत विविध लताओंसे एवं पल्लवोंसे रचित है, इन लताओंसे और भी नये-नये पल्लव प्रस्फुटित हुए हैं जिनसे यह लतानिकुञ्ज और भी अधिक घना हो गया है। अतः इस कोमल-पत्र-कुंजमें अपने प्रियतम श्रीकृष्णके साथ चिरकाल पर्यन्त विलास करती रहो। मधु-मुदित-मधुपकुल-कलित-रावे। विलस मदन-रस-सरस-भावे ॥ प्रविश....॥६॥ अन्वय - अयि मदन-रस-सरस-भावे (मदनरसेन शृङ्गाररसेन सरसभावः सारस्यं यस्याः अयि तादृशि) [ईदृग्विधायास्ते तन्निकटप्रवेश एव योग्यः] राधे मधुमुदित-मधुप-कुल-कलित-रावे (मधुना मकरन्देन मुदितं मत्तं मधुपकुलं भ्रमरवृन्दं तेन कलितः विहितः रावः गुञ्जनं यत्र तस्मिन्) इह (केलिसदने) माधवसमीपं प्रविश [ततश्च] विलस ॥६॥ अनुवाद - मदन-रससे सरस अनुरागमयी राधे! मधुपानमें प्रमत्त भ्रमरोंके कलनादसे निनादित निकुञ्ज-गृहमें प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो। पद्यानुवाद- गीत भ्रमर मद-माते गाते, 'सरस भाव' जन-हृदय जगाते- बालबोधिनी - सखी कहती है- हे राधे! कामदेवके उद्वेगसे उत्पन्न शृङ्गार-रसमें तुम भावमयी हो गयी हो। वसन्तमें परम आनन्द पानेवाले, पुष्परसके आस्वादनसे आनन्दपूर्वक गुंजार करनेवाले मधुमत्त भौंरोके झुण्डवाले लताभवनमें प्रवेश कर प्रेमरसका आस्वादन करो। यह एक बहुत बड़े आनन्दकी भूमिका है, प्रणय-मिलनका मंगल मुखरण है- चलो, इसमें प्रवेश करो।