गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५४ श्रीगीतगोविन्दम् मधुरतर-पिक-निकर-निनद-मुखरे । विलस दशन-रुचि-रुचिर-शिखरे ॥ प्रविश.... ॥७॥ अन्वय—अयि दशन-रुचि रुचिर-शिखरे (दशना दन्ता एव रुच्या कान्त्या रुचिराणि मनोज्ञानि शिखराणि माणिक्यविशेषाः यस्याः अयि तादृशि; पक्वदाड़िमबीजाभं माणिक्यं शिखरं विदुः इति हारावली; ईदृग्दशनायास्तत्क्रियाविशेषकृत्यमेव योग्यमिति भावः) राधे मधुरतर-पिक-निकर-निनद-मुखरे (मधुरतरैः निरतिशय-श्रुति-सुखकरैः पिकनिकराणां कोकिलवृन्दानां निनदैः कूजनैः मुखरे शब्दिते) इह (केलिसदने) माधवसमीपं प्रविश [ततश्च] विलस (विहर) ॥७॥ अनुवाद—सुपक्व दाड़िम (अनार) के बीज एवं शिखर नामक मुक्ताओंके समान दशन पंक्तिमयी राधे ! कोकिलनिकरके मधुरतर कूजन-कलापसे मुखरित लता-वास-गृहमें तुम प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो। पद्यानुवाद— 'विलसो' भर आनन्द स्वरोंमें— कूक रही कोकिल मधुवनमें। चल राधा ! पिय ढिग उपवनमें ॥ बालबोधिनी—सखी कहती है—हे दशनकी दीप्तिसे शोभायमान शिखर-मणिमयी राधे ! कोकिलाओंकी अत्यन्त मधुर काकलीसे गुञ्जायमान इस लता-निकुंजमें प्रवेशकर श्रीकृष्णके साथ विहार करो। लताओंसे सघन इस केलिगृहमें श्रीहरिके साथ मनभर विलसो, देर-देर तक विलसो। विहित-पद्मावती-सुख-समाजे। कुरु मुरारे! मङ्गलशतानि। भणति जयदेव-कविराज-राजे॥ प्रविश.... ॥८॥