गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३५५ अन्वय—हे मुरारे विहित-पद्मावती-सुख-समाजे (त्वल्लीला- वर्णनेन विहितः कृतः पद्मावत्या श्रीराधायाः स्वपत्न्या वा सुखसमाजः सुखसन्ततिः येन तस्मिन् पद्मावती-सुखसम्पादके इत्यर्थः) भणति (तद्रसं कीर्त्तयति) जयदेव-कविराजराजे (निजेष्टदेवोपासनाया नित्यत्व-सर्वोत्तमत्वनिश्चयावेशेन आत्मानं बहुमन्यमानस्य कविराज-राज इति प्रौढोक्तिरियं) मङ्गलशतानि (प्रभूतानि मङ्गलानि) कुरु (विधेहि)॥८॥ अनुवाद—कविकुलाधिराज कवि जयदेवके द्वारा श्रीराधाके विविध आनन्द-प्रसादनके लिए इस स्तुतिपरक गीतिकी रचना की गयी है। हे कृष्ण! आप इसका श्रवण कर प्रसन्न होवें और इस जगतका अनन्तान्त मङ्गल-विधान करें। बालबोधिनी—कवि जयदेव इस अष्टपदीको श्रीहरि चरणोंमें समर्पित करते हुए कहते हैं—हे मुरारे! जयदेव कविराजके इस गीतको श्रवणकर आप सबका हजारों प्रकारसे मङ्गल विधान करें। लक्ष्मीजीका एक नाम पद्मावती है, जयदेवकी पत्नीका नाम भी पद्मावती है। पद्मावतीके आराधक हैं जयदेव जो कविराजोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। अतः कविराजवर श्रीहरिसे प्रार्थना करते हैं—हे मुरारे! मैंने प्रासादके अन्तरमें पद्मावतीकी प्रतिष्ठा की है, आपकी प्रसन्नताके लिए यह कविता की है, आप प्रसन्न होवें और हमारा शतशः मङ्गल करें। अथवा श्रीजयदेव स्वयं श्रीराधासे अनुरोध कर रहे हैं—जो लक्ष्मीकी सारी सम्पदा, सारा सुख लेकर आज उपस्थित हैं, आप उन मुरारिके लिए सौ-सौ प्रकारके मङ्गल विधान करें। उनका मङ्गल तुम्हारे साथ रमण ही है। त्वां चित्तेन चिरं वहन्नयमतिश्रान्तो भृशं तापितः कन्दर्पेण च पातुमिच्छति सुधा-सम्बाध-विम्बाधरम्। अस्याङ्कं तदलङ्कुरु क्षणमिह भ्रूक्षेप-लक्ष्मीलव- क्रीते दास इवोपसेवित-पदाम्भोजे कुतः सम्भ्रमः॥१॥