भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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३५६ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[अथ सखी तस्याः प्रसाद्मालक्ष्य कौतुकेन सनन्मर्माह]—[सखि] चित्तेन (मनसा) त्वां चिरं वहन् (धारयन्) [तव पीनस्तन-श्रोणी-गुरुभारेण] अतिश्रान्तः, कन्दर्पेण भृशं (अत्यर्थं) तापितश्च; [अतएव श्रमेण तापने च पिपासितः] अयं (श्रीकृष्णः) [तव] सुधासम्बाधम् (सुधया अमृतेन सम्बाधं सङ्कटं व्याप्तमिति यावत्) विम्बाधरं पातुम् इच्छति; तत् (तस्मात्) अस्य अङ्गं (क्रोड्) क्षणम् अलङ्कुरु (शोभय) अन्तस्थितायाः बहिःस्थितस्य पानानुपपत्तेरिति भावः]। [ननु अविदित चित्तस्य अङ्गप्रवेशे मन्मनः सङ्कुचित इतिचेत् तत्राह]— भ्रूक्षेप-लक्ष्मी-लव-क्रीते (भ्रुवोः क्षेपः चालनं स एव लक्ष्मीः ऋद्धिः तस्या लवेन लेशेन क्रीते) [अतएव] उपसेवित-पदाम्भोजे (उपसेवितं पदाम्भोजं पादपद्मं येन तादृशे) दासे इव [अस्मिन् श्रीकृष्णो] सम्भ्रमः (सङ्कोचः) कुतः [अल्पमूल्यक्रीते दासे इव क्रयक्रीते शङ्का न युक्ता, क्रीतस्यैव सेवोपयोगादितिभावः]॥१॥ अनुवाद—हे सुन्दरि ! तुम्हारे सामने अवस्थित अनङ्गतापसे सन्तप्त श्रीकृष्ण दीर्घकालसे तुमको मन-ही-मन धारण किये हुए अतिशय क्लान्त हो गये हैं, वे तुम्हारे बिम्बसम अधरकी मधुर सुधाका पान करनेके लिए लोलुप हो रहे हैं, तुम अभिलाषी प्रियके अङ्कको अलंकृत करो। वे तुम्हारे कटाक्षरूप विपुल वैभवके कणमात्रके क्षण-भर पान करनेके लिए चिरकृतज्ञ हो रहे हैं, उस कटाक्ष-विक्षेपरूपी मूल्यके द्वारा क्रीतदासकी भाँति तुम्हारे पदारविन्दके सेवक हो गये हैं, फिर सम्भ्रम क्यों? कैसी घबराहट ? बालबोधिनी—सखी श्रीराधासे कहती है—हे राधे ! आपको चिरकाल तक हृदयमें धारण करनेके कारण श्रीहरि श्रान्त-क्लान्त हो गये हैं, अन्दर-ही-अन्दर अभितप्त हो गये हैं, कामदेवने इन्हें अत्यन्त सन्तप्त कर दिया है, आपके सुधारससे परिपूर्ण कुन्दरु फलके सदृश अरुण अधरोंकी मधुराईका पान करना चाहते हैं। इसलिए हे प्रिये! अपने इन अभिलाषी प्रियके