भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 389, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 389

एकादशः सर्गः-सामोद-दामोदरः ३५७ अंगोंकी शोभा बनिये ! एक क्षणके लिए ही कटाक्ष विक्षेप कर तुमने इन्हें अपना क्रीतदास बना लिया है। तुम्हारे चरणोंकी सेवा करनेवाले श्रीकृष्णके अंकको समलंकृत करो, बिना संकोचके उनके वक्षःस्थलको अलंकृत करो। इसमें कैसी लज्जा, कैसा भाव और कैसी हिचक ? प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीडित छन्द तथा रूपक एवं उत्प्रेक्षा अलंकार है। सा ससाध्वस-सानन्दं गोविन्दे लोललोचना। सिञ्जान-मञ्जु-मञ्जीरं प्रविवेश निवेशनम् ॥२॥ इति एकविंशः सन्दर्भः। अन्वय-गोविन्दे (श्रीहरौ) लोल-लोचना (लोले सतृष्णे लोचने यस्याः सा) सा (राधा) शिञ्जानमञ्जुमञ्जीरं (शिञ्जानः शब्दायमानः मञ्जुमञ्जीरः मनोज्ञनूपुरः यत्र तद्यथा तथा) ससाध्वस-सानन्दं (ससाध्वसं ससम्भ्रमं सानन्दञ्च यथा तथा; प्रथम-समागमवत् ससाध्वसं विनत्यनन्तर-प्राप्त्या सानन्दमिति ज्ञेयम्) निवेशनं (कुञ्जगृहं) प्रविवेश॥२॥ अनुवाद- श्रीराधा स्पृहायुक्त हृदयसे अपने चञ्चल नेत्रोंसे श्रीगोविन्दका अवलोकन करती हुई लज्जा और हर्षसे मणिमय नूपुरोंसे मनोहर शब्द करती हुई निकुंज गृहमें प्रवेश करने लगीं। पद्यानुवाद- हुलस उठी राधा मधुवनमें अपना ही प्रतिबिम्ब देखकर अपने जीवन-धनमें। चिर अभिलाष विलास भरे हरि, डूबे हर्ष मदनमें, सिहर उठी राधा अति मनमें, हुलस उठी राधा मधुवनमें। बालबोधिनी-सखीके द्वारा समझा-बुझाने पर श्रीराधाने रतिक्रीड़ाके लिए उपयोगी लता-निकुंजमें भीतर-भीतर कुछ

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक) · पृष्ठ 389, कुल 448 में से · BharatKosha