भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 390

काँपती हुई, कुछ उमगती हुई, इधर-उधर देखकर साभिलाष श्रीगोविन्दको निहारती हुई, चरण-नूपुरोंको झंकारती हुई प्रवेश किया। प्रविष्ट होते हुए जब उन्होंने श्रीकृष्णको देखा तो उन्हें ऐसा लगा कि वे मानो अंग-अंगमें श्रीराधाको ही धारण कर रहे हैं। गीतम् ॥२२॥ वराड़ीरागयतितालाभ्यां गीयते। बालबोधिनी—एक सुकेशी हाथोंमें कंकण धारण कर, कानोंमें ढेरसे पुष्प धारणकर लजाई हुई-सी हाथमें चामर लेकर वीजन करती हुई जब दयितके साथ विनोदन करती है, ऐसे समयमें उस वराङ्गनाके गीतको वराड़ी राग कहा गया है। राधा-वदन-विलोकन-विकसित-विविध-विकार-विभङ्गम्। जलनिधिमिव विधु-मण्डल-दर्शन-तरलित-तुङ्ग-तरङ्गम् ॥१॥ हरिमेकरसं चिरमभिलषित-विलासम्। सा ददर्श गुरुहर्ष-वशंवद वदनमनङ्ग-निवासम् ॥ध्रुवपदम् ॥ अन्वय—[एवं कुञ्ज प्रवेशमुक्त्वा श्रीकृष्णस्य तद्दर्शनानन्द- विकारान् वर्णयन् तस्या स्तद्दर्शनमाह]—सा (श्रीराधा) एकरसं (एकस्मिन्नेव आलम्बने श्रीराधारूपे रसो यस्य तं; तस्याः सर्वोत्तमत्व-निश्चयेन तदेकपरमित्यर्थः) [ननु अन्याङ्गनाभिः रममाणस्य कुतस्तत्परत्वमित्यत आह]—चिरं (बहुकालं) अभिलषित-विलासं (पूर्वोक्तरूपेण अभिलषितः आकाङ्क्षितः तया सह विलासो येन तम्) [अतस्तत्प्रसादावलोकनात्] गुरुहर्षवशंवद-वदनं (गुरुहर्षस्य वशंवदम् आयत्तं वदनं मुखं यत्र तादृशं हर्षेण स्मेराननमित्यर्थः) [अतएव] अनङ्गविकाशं (अनङ्गस्य कामस्य विकाशः यत्र तादृशं) [तदेकनिष्ठत्वं