गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३५९ दृष्टास्तेन स्पष्टयति]—राधावदनवलोकन-विकसित-विविध- विकार-विभङ्गं (राधावदनवलोकनेनैव विकसिताः प्रकटिताः विविधविकाराः कामजाः हर्षस्तम्भादयः ते एव विभङ्गाः ऊर्म्मयः यत्र तादृशं) विधुमण्डलस्य चन्द्रमण्डलस्य दर्शनेन तरलिताः चञ्चलीकृताः तुङ्गाः महान्तः तरङ्गाः यत्र तादृशं) जलनिधिं (समुद्रम्) इव हरिं ददर्श; [अत्र श्रीकृष्णसमुद्रयोः विकारोर्म्योश्च साम्यम्] ॥१॥ अनुवाद—एकरस अर्थात् राधाविषयक अनुरागसे युक्त तथा चिरकालसे श्रीराधाके साथ विलासकी अभिलाषा रखने वाले श्रीराधा-वदन अवलोकन जन्य हर्षसे प्रफुल्लित, श्रीकृष्ण रोमाञ्च आदि विविध सात्त्विक मदन-विकाररूप भावोंसे युक्त हो रहे हैं। जिस प्रकार शशधर-मण्डलके दर्शनसे समुद्रमें उत्ताल-तरङ्ग समुदाय तरंगायित हो उठता है, उसी प्रकार काम-रसके समुद्र-स्वरूप, भावभङ्गिमा द्वारा मदन-आसक्ति प्रकाशित करनेवाले श्रीकृष्णको श्रीराधाने निकुञ्ज गृहमें देखा। पद्यानुवाद— राधा-वदन विलोकनसे हैं विकसित विविध विकार जैसे विधुको जोह जलधि लहरों भर लाता ज्वार। बालबोधिनी—निकुञ्ज गृहमें श्रीराधाने श्रीकृष्णको अत्यधिक स्नेहके साथ देखा, देखा श्रीकृष्णकी अनेक विशेषताओंको, सारी विशेषताएँ श्रीराधासे ही सम्बन्धित। श्रीहरि समभावपूर्ण हैं, एकरस हैं, एक ही शृङ्गार रस अपनी प्रधानता बनाये हुए है, वे अनेक प्रकारके शृङ्गार रसके भावोंसे परिपूर्ण हैं। राधाविषयक अनुराग ही उनमें उछल रहा है, चिरकालसे श्रीराधाके साथ विलास करनेकी इच्छा संजोये हुए हैं, केलिकुंजमें श्रीराधाका आना ही उनके जीवनका सर्वस्व है, उनके दर्शनसे उनमें आनन्दका उद्रेक हो गया, अनेक प्रकारके कम्प-पुलकादि सात्त्विक विकार उदित हो उठे।