गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० श्रीगीतगोविन्दम् ऐसा लग रहा था जैसे श्रीराधाका मुखमण्डल कामदेवका निवास स्थान है, जिसे देखकर श्रीकृष्णका मुखमण्डल हर्षसे दीप्त हो उठा है और अपनी मिलन-इच्छाको पूर्ण करना चाहता है, मानो श्रीराधाका मुख चन्द्रमण्डल हो, जिसे देखकर कृष्णरूपी समुद्र चञ्चल हो उठा हो और उसमें ऊँची-ऊँची तरंगें उच्छलित हो रही हों। श्रीराधाने देखा श्रीकृष्ण उन्हें देखते ही विविध काम-भावनाएँ प्रकाशित करने लगे हैं॥१॥ हारममलतर-तारमुरसि दधतं परिलम्ब्य विदूरम्। स्फुटतर फेन-कदम्ब-करम्बितमिव यमुनाजल-पूरम्॥ हरि....॥२॥ अन्वय—[अतःपरं सप्तमं यावत् श्रीहरिमेव विशिनष्टि]— उरसि (वक्षसि) विदूरं परिलम्ब्य (सुदीर्घमित्यर्थः) अमलतरतारं (अमलतरः अत्युज्ज्वलः) तारः मुक्ताफलं यस्य तादृशम्; मुक्ताशुद्धौच तारः स्यात् इति विश्वः) हारं दधतं (धारयन्तं) [अतएव] स्फुटतरफेन-कदम्ब-करम्बित-यमुना-जलपूरम् (स्फुटतरेण फेन-कदम्बेन-फेन-चयेन करम्बितं खचितं यमुना- जलस्य पूरं प्रवाहमिव स्थितं) [हरिं सा ददर्श इति शेषः]। [अत्र यमुना-जल-पूरेण श्रीहरेः फेनसमूहेन च हारस्य साम्यम्] ॥२॥ अनुवाद—श्रीहरिने निज विमल उर-स्थल पर निर्मल मुक्ताओंसे रचित मनोहर हारका परिधान कर रखा है, जो उनके हृदयका बार-बार आलिङ्गन कर रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो यमुना नदीका जल स्फुट रूपमें विराजमान फेन-समूहको धारण कर रहा है। पद्यानुवाद— उर पर लहराता है हरिके अमल तारका हार, मानो फेन-कदम्ब-करम्बित जमुना-जलकी धार। हुलस उठी राधा मधुवनमें। विलस उठी राधा अति मनमें॥