भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 448 में से

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एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३६१ बालबोधिनी—प्रस्तुत पदमें श्रीकृष्णकी उपमा यमुनाके आपूरित जल प्रवाहसे की गयी है, उनके नीलवर्ण वक्षस्थलको बार-बार आलिङ्गन करनेवाला शुभ्र जानुपर्यन्त लटकता हुआ शुभ्र मुक्ताहार ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो यमुनाका नीला जल सफेद फेनसे मिश्रित होकर प्रकाशित हो रहा हो अथवा यमुनाके जलमें फेन मिल गया हो। प्रस्तुत पद श्रीराधा-दर्शनसे श्रीकृष्णमें उद्भूत स्वेद नामक सात्त्विक भावके प्रकाशनको भी सूचित कर रहा है। श्यामल-मृदुल-कलेवर-मण्डलमधिगत-गौरदुकूलम् । नील-नलिनमिव पीत-पराग-पटल-भर-वलयित-मूलम् ॥ हरि.... ॥३॥ अन्वय—अधिगत-गौरदुकूलं (अधिगतं प्राप्तं परिहितमिति यावत् गौरं पीतं दुकूलं पट्टाम्बरं येन तं) [तथा] श्यामल मृदुल-कलेवर-मण्डलं (श्यामलं मृदुलञ्च कोमलञ्च कलेवर- मण्डलं यस्य तं; यथोचितावयव-सन्निवेश-प्रतिपादनार्थं मण्डलत्वेनोक्तिः) [अतः] पीतपरागपटलभरवलयितमूलं (पीतेन परागाणां मध्यस्थरजसां पटल-भरेण समूहातिशयेन वलयितं वेष्टितं मूलं यस्य तं) नीलनलिनम् (नीलोत्पलम्) इव [हरिं ददर्श]। [नीलकमलेन श्रीहरेः परागेण च पीतवसनस्य साम्यम्] ॥३॥ अनुवाद—श्रीहरिने अपने श्यामल मृदुल कलेवर पर पीत वसन धारण किया है, ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो नीलपद्म सुवर्ण-पर्णके पराग-निलयसे साङ्गोपाङ्ग सराबोर हो गया हो। पद्यानुवाद— श्यामल कोमल वपु पर सज्जित सुन्दर गौर दुकूल, पीत पराग पटल है राजित ज्यों नलिनीके फूल। बालबोधिनी—श्रीहरिका श्रीविग्रह श्यामवर्ण है, जिस पर उन्होंने पीत वर्णका पीताम्बर धारण कर रखा है, वह इस

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