भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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३६२ श्रीगीतगोविन्दम् प्रकार सुशोभित हो रहा है, जैसे नीलकमल अपने पीले परागसे परिपूर्ण रूपसे परिवेष्टित-मंडित हो रहा हो। इस बातकी भी सूचना दी जा रही है कि श्याम-वर्णके वक्षःस्थल पर तुम गौराङ्गीकी शोभा भी अत्यधिक होगी। इस प्रकार विपरीत-रति भी प्रदर्शित हुई है। तरल-दृगञ्चल-चलन-मनोहर-वदन-जनित-रतिरागम् । स्फुट-कमलोदर-खेलित-खञ्जन-युगमिव शरदि तडागम् ॥ हरि.... ॥४ ॥ अन्वय-तरल-दृगञ्चल-चलन-मनोहर-वदन-जनित-रतिरागम् (तरलस्य चञ्चलस्य दृगञ्चलस्य चलनेन कटाक्षक्षेपेण मनोहरं यत् वदनं तेन जनितः उत्पादितः रतिरागः सुरतौत्सुक्यं येन तं) [अतएव] शरदि (शरतत्काले) स्फुटकम्लोदर-खेलित- खञ्जनयुगम् (स्फुटं विकसितं यत् कमलं पद्मं तस्य उदरे अभ्यन्तरे खेलितं क्रीडापरं खञ्जनयुगं यत्र तादृशं) तड़ागम् इव [हरिं सा ददर्श इति शेषः]। [अत्र श्रीहरेः तड़ागेन वदनस्य कमलेन, नयनयोश्च खञ्जनयुगलेन साम्यम्] ॥४॥ अनुवाद-जिन श्रीकृष्णका मनोहर वदन शरद् कालके निर्मल सरोवरमें विकसित नील-कमलकी शोभाके समान है, उस मुख पर चंचल नयनोंकी अपाङ्ग-भङ्गिमा श्रीराधाके प्रति इस प्रकार मदन-अनुराग उद्दीप्त करा रही है, मानो कमल पर खञ्जन पक्षी क्रीड़ापरायण हो रहे हों। पद्यानुवाद- तरल दृगंचल चलन मनोहर वदन उदित रति-राग, खेल रहे खंजन कंजोदर मानो शरद तड़ाग। हुलस उठी राधा मधुवनमें। विलस उठी राधा अति मनमें ॥ बालबोधिनी-जब श्रीराधाने निकुंज-सदनमें प्रवेश किया, तब श्रीकृष्णके नेत्र अति चंचल हो उठे, उनके मन्द-मन्द