भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३६३ मुस्कानसे युक्त अति मनोहर मुखड़ेको देखकर श्रीराधाके मनमें रतिविलास करनेकी इच्छा उत्पन्न हो उठी। श्रीकृष्णका सस्मित मुख उस शरद्कालीन प्रफुल्लित कमलके समान लग रहा था, जिस पर दो खञ्जन पक्षी क्रीड़ा कर रहे हों। वस्तुतः उनके नेत्रोंकी चंचलता क्रीड़ापरायण खंजरीट खगोंके (खञ्जन पक्षीके) समान लग रही थी। श्रीराधाको देखकर श्रीकृष्ण अविकारी ही रहे। अतएव यहाँ उनकी उपमा शरद्कालीन तड़ागसे दी गयी है। प्रस्तुत श्लोकमें नेत्रोंकी चंचलता रतिरागको व्यक्त कर रही है, उनके भ्रू-क्षेप (कटाक्ष) श्रीराधाके मन्मथको अभिवृद्धित करनेवाले हैं। शरद्कालमें खंजन खगका वर्णन उचित ही है। 'कमलोदर' पदसे 'पद्मासन' नामक रतिविशेष भी सूचित हुआ है। उनका मनोहर मुख युवतियोंमें रतिकी अभिलाषा उत्पन्न करनेवाला है। वदन-कमल-परिशीलन-मिलित-मिहिर-सम-कुण्डल-शोभम्। स्मित-रुचि-कुसुम-समुल्लसिताधर-पल्लव-कृत-रति-लोभम्॥ हरि....॥५॥ अन्वय—वदन-कमल-परिशीलन-मिलित-मिहिर-सम-कुण्डल- शोभम् (वदनमेव कमलं तस्य परिशीलनाय विकाशाय मिलिताभ्यां समागताभ्यां मिहिरसमाभ्यां सूर्यसदृशाभ्यां कुण्डलाभ्यां शोभा यत्र तादृशं; सूर्यमण्डलद्वयमिव कुण्डलयुगलं धारयन्त- मित्यर्थः) [तथाच] स्मित-रुचि-कुसुम-समुल्लसिताधर-पल्लव- कृत-रति-लोभम् (स्मितरुचिः मृदुहास्यप्रभा स एव कुसुमं तेन समुल्लसितः यः अधर-पल्लवः तेन कृतः उत्पादितः [तस्याः] रतिलोभो येन तादृशम्) [हरिं सा ददर्श] ॥५॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके वदन-कमलकी शोभाका परिशीलन करनेके लिए अरुण वर्णके सदृश लोहित वर्णीय मणिमय कुण्डलद्वय अति सुन्दर रूपसे शोभा पा रहे हैं एवं रुचिर