गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६४ श्रीगीतगोविन्दम् मन्द-मन्द हास्यप्रभाकी कान्तिसे युक्त होकर उल्लसित, स्फूर्त्तियुक्त अधर-पल्लव श्रीराधाकी रति-लालसाको समुद्भूत करा रहे हैं। पद्यानुवाद— वदन कमल पर रविसे राजित युग कुण्डल अति सुन्दर। हिल पल्लवसे होंठ जताते चुम्बन हित ज्यों आतुर॥ बालबोधिनी—उस समय निकुंजमें श्रीकृष्णके कानोंमें विभूषित दोनों कुण्डल ऐसे लग रहे थे मानो दो सूर्य उनके प्रफुल्लित मुखकमलका स्पर्श प्राप्त करनेके लिए कपोलों पर मिलित हो रहे हों। इस प्रसंगसे अर्थात् मिहिर-प्रकाशसे रतिकालका अन्त भी सूचित हो रहा है। उस पर भी श्रीकृष्ण मन्द-मन्द मुस्करा रहे हैं। स्मित कान्तिसे उनका वदनकमल और भी रुचिर एवं समुज्ज्वलित लग रहा है। उनके अधरपल्लव रति-लोभकी तृष्णा अभिव्यक्त कर रहे हैं और श्रीराधाके अधर पानके लिए उत्कण्ठित हो रहे हैं। श्रीकृष्णके ऐसे मुखकमलको देखकर श्रीराधाके मनमें भी रति-इच्छा समद्भूत हो गयी। श्रीराधा ऐसे सौन्दर्य-सार भूषण श्रीकृष्णको देखती रहीं। शशि-किरण-च्छुरितोदर-जलधर-सुन्दर-सकुसुम-केशम्। तिमिरोदित-विधुमण्डल-निर्मलमलयज-तिलकनिवेशम् ॥ हरि.... ॥६ ॥ अन्वय—शशि-किरण-च्छुरितोदर-जलधरसुन्दर-सकुसुमकेशं (शशिनः चन्द्रस्य किरणैः छुरितं व्याप्तम् उदरं यस्य तादृशः यः जलधरः तद्वत्-सुन्दराः सकुसुमाः कुसुमखचिताः केशाः यस्य तम्) [अत्र केशानां जलधरेण पुष्पाणाञ्च इन्दूकिरणेन साम्यम्] [तथा च] तिमिरोदित-विधुमण्डल-निर्म्मल-मलयज- तिलकनिवेशं (तिमिरे अन्धकारे उदितं विधुमण्डलमिव निर्मलः मलयजतिलक-निवेशः चन्दन-तिलक-विन्यासः यस्य तम्)