भारतकोश
संग्रह पर लौटें

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

३६४ श्रीगीतगोविन्दम् मन्द-मन्द हास्यप्रभाकी कान्तिसे युक्त होकर उल्लसित, स्फूर्त्तियुक्त अधर-पल्लव श्रीराधाकी रति-लालसाको समुद्भूत करा रहे हैं। पद्यानुवाद— वदन कमल पर रविसे राजित युग कुण्डल अति सुन्दर। हिल पल्लवसे होंठ जताते चुम्बन हित ज्यों आतुर॥ बालबोधिनी—उस समय निकुंजमें श्रीकृष्णके कानोंमें विभूषित दोनों कुण्डल ऐसे लग रहे थे मानो दो सूर्य उनके प्रफुल्लित मुखकमलका स्पर्श प्राप्त करनेके लिए कपोलों पर मिलित हो रहे हों। इस प्रसंगसे अर्थात् मिहिर-प्रकाशसे रतिकालका अन्त भी सूचित हो रहा है। उस पर भी श्रीकृष्ण मन्द-मन्द मुस्करा रहे हैं। स्मित कान्तिसे उनका वदनकमल और भी रुचिर एवं समुज्ज्वलित लग रहा है। उनके अधरपल्लव रति-लोभकी तृष्णा अभिव्यक्त कर रहे हैं और श्रीराधाके अधर पानके लिए उत्कण्ठित हो रहे हैं। श्रीकृष्णके ऐसे मुखकमलको देखकर श्रीराधाके मनमें भी रति-इच्छा समद्भूत हो गयी। श्रीराधा ऐसे सौन्दर्य-सार भूषण श्रीकृष्णको देखती रहीं। शशि-किरण-च्छुरितोदर-जलधर-सुन्दर-सकुसुम-केशम्। तिमिरोदित-विधुमण्डल-निर्मलमलयज-तिलकनिवेशम् ॥ हरि.... ॥६ ॥ अन्वय—शशि-किरण-च्छुरितोदर-जलधरसुन्दर-सकुसुमकेशं (शशिनः चन्द्रस्य किरणैः छुरितं व्याप्तम् उदरं यस्य तादृशः यः जलधरः तद्वत्-सुन्दराः सकुसुमाः कुसुमखचिताः केशाः यस्य तम्) [अत्र केशानां जलधरेण पुष्पाणाञ्च इन्दूकिरणेन साम्यम्] [तथा च] तिमिरोदित-विधुमण्डल-निर्म्मल-मलयज- तिलकनिवेशं (तिमिरे अन्धकारे उदितं विधुमण्डलमिव निर्मलः मलयजतिलक-निवेशः चन्दन-तिलक-विन्यासः यस्य तम्)

एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३६५ [हरिं सा ददर्श] [अत्र ललाटस्य तिमिरेण, तिलकस्य च इन्दुमण्डलेन साम्यम्] ॥६॥ अनुवाद—कुसुमोंसे अलंकृत श्रीकृष्णका केश-पाश चन्द्रकिरणोंसे अनुरञ्जित होकर नवजलधर मालाके समान प्रतीत हो रहा है, ललाट पर धारण किया चन्दनतिलक इस प्रकार शोभा प्राप्त कर रहा है, मानो निर्मल आकाशमें अन्धकारके मध्य पूर्ण विधुमण्डल उदित हुआ हो। पद्यानुवाद— घनमें इंदु किरण सम सज्जित सुन्दर कुसुमित केश, तिमिरोदित विधु मण्डल मानो मलयज-तिलक-निवेश। हुलस उठी राधा मधुवनमें। विलस उठी राधा अति मनमें॥ बालबोधिनी—श्रीकृष्णकी सुन्दर अलकावली पुष्पोंसे समलंकृत हो रही थी। उन प्रफुल्लित समुज्ज्वलित पुष्पोंकी शोभा ऐसी लग रही थी मानो काली-काली घटाओंके मध्यमें चन्द्रमा छिप रहा हो। अथवा उन काले केशोंके मध्यमें चन्द्रकिरण व्याप्त हो रही है अथवा बादलोंके बीचमेंसे चन्द्रमा उदित हो रहा हो। छोटे-छोटे बादलोंके बीचमें जहाँ चाँदनी आलोकित होती है वहाँ फूलोंके गुम्फन स्पष्ट दिखायी देते हैं। जहाँ नहीं होती, वे कजरारे बने रहते हैं। श्रीकृष्णके श्यामवर्णके मस्तक पर मलयगिरिका चन्दनका तिलक ऐसी शोभा दे रहा था मानो अंधकारके बीच पूर्ण चन्द्रमण्डल उदित हुआ हो। श्रीराधा मिलनसे श्रीकृष्णका परिधान एवं शृङ्गार गौरवर्ण हो गया है, श्रीराधामय हो गया है। ऐसे गौरमय श्रीश्यामसुन्दरको श्रीराधा देखती रहीं। विपुल-पुलक-भर-दन्तुरितं रति-केलि-कलाभिरधीरम्। मणिगण-किरण-समूह-समुज्ज्वल-भूषण-सुभग-शरीरम् ॥ हरि.... ॥७॥

३६६ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—विपुल-पुलक-भर-दन्तुरितं (विपुलो महान् यः पुलकभरः रोमाञ्चातिशयः तेन दन्तुरितं विषमीकृतं क्वचिदुन्नतं क्वचिच्चानतमिति यावत्) [अतएव तद्दर्शनात् हृदि उद्गतैः] रतिकेलिकलाभिः (सुरतक्रीड़ाविलासैः) अधीरं (व्याकुलं) [तथाच] मणिगण-किरण-समूह-समुज्ज्वल-भूषण-सुभग-शरीरम् (मणिगणानां रत्नसमूहानां परिहितानामित्यर्थः किरणसमूहैः समुज्ज्वलानि भूषणानि अलङ्काराः तैः सुभगं सुन्दरं शरीरं यस्य तादृशं) [हरिं सा ददर्श इति शेषः] ॥७॥ अनुवाद—श्रीराधा-अवलोकनसे श्रीकृष्णका शरीर विपुल पुलकोंसे रोमाञ्चित हो रहा है, रति-केलि-विषयक विविध कथा मनमें समुदित होनेसे वे अति अधीर हो रहे हैं, श्रीविग्रह मणियोंकी किरणोंसे समुज्ज्वलित होकर अतीव मनोहर द्युतिको धारण कर रहा है। पद्यानुवाद— विपुल पलक भर ललक केलि रति दिखते अधिक अधीर। मणि गण किरण समूह समुज्ज्वल भूषण सुभग शरीर॥ बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णको देख रही हैं कि उनका सम्पूर्ण शरीर पुलकित हो रहा है, अद्भुत रोमांचसे युक्त हो रहा है, रति-क्रीड़ाके लिए वे एक विचित्र आकुल प्रत्याशासे अधीर तो हो ही रहे थे, श्रीराधा-मिलनसे तो रति-केलि-कलामें उपयोगी चुम्बनादि क्रियाओंमें व्यस्त होनेके कारण और भी चंचल हो उठे। मणिमय भूषणोंकी कान्तिसे देदीप्यमान होनेके कारण उनका श्रीविग्रह अत्यधिक सुशोभित हो रहा था, जिन आभूषणोंको उन्होंने धारण कर रखा था, उन आभूषणोंमें लगी हुई मणियोंके किरणसमूहसे सभी आभूषण चमचमा रहे थे—ऐसे मणिमय अलंकारोंसे सुन्दर वपुवाले श्रीकृष्णको श्रीराधाने देखा।

एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३६७ श्रीजयदेवकवि-भणित-विभव-द्विगुणीकृत-भूषणभारम्। प्रणमत हृदि विनिधाय हरिं सुचिरं सुकृतोदय-सारम् ॥ हरि.... ॥८ ॥ अन्वय—[भोः साधवः] श्रीजयदेव-भणित-विभव-द्विगुणीकृत- भूषण-भारं श्रीजयदेवस्य भणितमेव विभवः समृद्धिः तेन द्विगुणीकृतः नितरां परिवर्द्धित इत्यर्थः भूषणस्य अलङ्कारस्य भारः गौरवं यत्र तादृशं) [यैः स्वयमलंकृतं ते अलङ्काराः जयदेवस्य उपमादि-वाग्विलासैः द्विगुणीकृता इत्यर्थः] [तथा] सुकृतोदयसारम् (सुकृतस्य पुण्यविशेषस्य य उदय आविर्भावः फलमितियावत् तस्य सारभूतं) हरिं सुचिरं [यथा तथा] हृदि (चित्तमध्ये) विनिधाय (भक्तिभरेण स्थापयित्वा) प्रणमत ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा विरचित विविध अलंकृत वाक्यरूप अलंकारसे जिनके परिहित भूषण-राशिकी शोभा द्विगुणित हो गयी है, हे रसिक भक्तों ! कृत-पुण्योंके फलस्वरूप उन श्रीकृष्णको हृदयमें यत्नके साथ धारण कर आप उन्हें प्रणाम करें। पद्यानुवाद— श्रीजयदेवकथित हरि-वर्णन द्विगुणित भूषण भार, हो हियमें अंकित जब जनके उदित पुण्यका सार। हुलस उठी राधा मधुवनमें। विलस रही राधा उपवनमें ॥ बालबोधिनी—प्रस्तुत प्रबन्धके इस आठवें पद्यके द्वारा कवि जयदेव कहते हैं कि हे भक्तजनों ! कवि-शिरोमणि जयदेवकी कविताके कारण श्रीकृष्णके आभूषणोंकी शोभा द्विगुणित हो गयी है अथवा जयदेव कवि द्वारा कथित श्रीकृष्णका वैभव द्विगुणित अलंकारोंसे युक्त है। चिरकालसे सञ्चित पुण्योदयके तत्त्वरूप श्रीकृष्णको चित्तमें धारण कर उन्हें प्रणाम कीजिए। बड़े पुण्योंसे ऐसे श्रीकृष्ण मनमें उदित होते हैं, वे श्रीराधाके संगसे जुड़कर द्विगुणित भूषणके भारसे

३६८ श्रीगीतगोविन्दम् श्रीराधासे जुड़कर द्विगुणित हो जाते हैं। ऐसे श्रीकृष्ण जिन्हें श्रीराधा निरन्तर देख रही हैं, नित्यकालके लिए हृदयमें विराजमान हो जायें। श्रीगीतगोविन्द काव्यके इस बाईसवें प्रबन्धका नाम 'सानन्द गोविन्दराग श्रेणिकुसुमाभरण' है। अतिक्रम्यापाङ्गं श्रवणपथपर्यन्तगमन- प्रयासेनेवाक्ष्णोस्तरलतरतारं पतितयोः। तदानीं राधायाः प्रियतम-समालोकसमये पपात स्वेदाम्बुप्रकर इव हर्षाश्रुनिकरः ॥१॥ अन्वय—[अथ श्रीकृष्णस्य श्रीराधिकादर्शनानन्द-विकारमुक्त्वा इदानीं श्रीराधायास्तद्दर्शनानन्दविकारमाह]—तदानीं प्रियतम-समालोक समये (प्रियतमस्य श्रीकृष्णस्य दर्शनकाले) अपाङ्गम् (नेत्रप्रान्तं) अतिक्रम्य श्रवण-पथपर्यन्त गमनप्रयासेनेव (कर्णान्तपर्यन्तं बहुदूरमित्यर्थः गमनप्रयासेनेव) तरलतर-तारं (तरलतरा अतिचञ्चला तारा नेत्रकनीनिका यत्र तद्यथा तथा) पतितयोः राधायाः अक्ष्णोः (नेत्रयोः अतृप्तयोरिति शेषः) स्वेदाम्भः-प्रकरः (श्रमजातघर्मजलप्रवाहः) इव हर्षाश्रुनिकरः (आनन्दाश्रुचयः) पपात। [अत्रायं भावः—यः अत्यन्तं गच्छति गतिवेगवशात् स घर्माक्तः भूमौ पतति; पतित्वाच झटिति उत्थाय किमहं केनापि दृष्ट इति सलज्जः तरलतरतारः दिशः अवलोकयति; द्रुततरगमनायासात् तस्य तनोः घर्मवारि प्रसरति च; तद्वत् श्रीकृष्णावलोकनसमये श्रीराधायाः नेत्रयुग्मम् अपाङ्गमतिक्रम्य कर्णयुगलं यावत् गतं, तेन च सुदूरगमनश्रमादिव आनन्दाश्रु- व्याजेन घर्मवारि निःससार] ॥१॥ अनुवाद—प्राणेश्वरके मिलन-क्षणोंमें श्रीराधाके अतृप्त नयन-युगलने अपाङ्गको अतिक्रमण कर श्रवण-पथ पहुँचनेका प्रयास किया। इस प्रयासमें चंचल बने नेत्रोंसे पसीनेके प्रसारके रूपमें हर्ष ही अश्रु-धारा बनकर प्रवाहित होने लगा।

एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३६९ बालबोधिनी—चिरकालके विरहके पश्चात् जब श्रीराधाका श्रीकृष्णके साथ मिलन हुआ तो श्रीराधाके नेत्र अपाङ्गों (कटाक्षपातों) का अतिक्रमण करके कानों तक पहुँच गये। इसी श्रमसे मानो उनके नेत्रोंमें पसीना आनन्दाश्रुके रूपमें जलधाराके समान बहने लगा। इतने समय बाद प्रियतमको देखा तो हर्ष स्थिर न रह सका, आँखोंसे छलछलाने लगा। रतिक्रीड़ाके आस्वादनसे आँखें पसीना-पसीना हो गयीं। बड़ी-बड़ी आँखें कानों तक पहुँचना चाहती थीं और इसी प्रयासमें उनमें शैथिल्य आ गया। शिथिलताके कारण वे नमित हो गयीं, झुक गयीं, जलमय हो गयीं। नेत्र-प्रान्तका अतिक्रमण करके श्रवण पथ तक जानेके प्रयासमें स्वेद-अम्बु छलछलाया। नेत्रोंमें प्रिय-दर्शनकी आकांक्षासे अति चंचलत्व तो हो रहा था। श्रीराधाका सात्विक भाव प्रकाशित हुआ है। प्रस्तुत श्लोकमें उपमा अलंकार है और शिखरिणी छंद है। भजन्त्यास्तल्पान्तं कृत-कपट-कण्डूति-पिहित- स्मितं याते गेहाद् बहिरबहिताली-परिजने। प्रियास्यं पश्यन्त्याः स्मरशर-समाहूत-सुभगं सलज्जा लज्जापि व्यगमदिव दूरं मृगदृशः ॥२॥ अन्वय—[ततः शय्यान्तिकं गतायास्तस्याः प्रियदर्शनावेशेन लज्जा विगलिता इत्याह]—कृत-कपट-कण्डूति-पिहित-स्मितं (कृता या कपटकण्डूतिः छलकण्डुयनं तया पिहितम् आच्छादितं स्मितम् ईषद्धास्यं यथा तथा) अवहिताली-परिजने (तत्सुखानुकूल्ये अवहितः सावधानः यः आलीपरिजनः सखीजनः तस्मिन्) गेहात् (निकुञ्जभवनात्) बहिः याते (प्रस्थिते) [सति] तल्पान्तं (शय्यान्तिकं) भजन्त्याः (गच्छन्त्याः) स्मरशरसमाहूतसुभगं (स्मरशरेण समाहूतं यत् हास्यकटाक्षादिकं तेन सुभगं

३७० श्रीगीतगोविन्दम् सुन्दरं-यथास्यात् तथा; यद्वा स्मरशरसमाहूतसुभगमिति प्रियास्य- मित्यस्य विशेषणम्) प्रियास्यं (श्रीकृष्णवदनं) पश्यन्त्याः मृगदृशः (मृगाक्ष्याः श्रीराधायाः) लज्जापि सलज्जा [सती] दूरं व्यगमदिव (विशेषेण अगमदिव) [सखीसमक्षं श्रीराधा सलज्जा आसीत् अधुना तासां कुञ्जभवनात् बहिर्गमनेन सा लज्जां विहाय यथाभिलषितं विजहार इत्यर्थः] ॥२॥ अनुवाद—श्रीराधाकी सुखाभिलाषिणी सहचरियाँ कुरङ्गनयना राधिकाको केशवकी शय्या पर उपवेशन करते देख सावधानीसे कपट-कण्डूयनका बहाना करती हुई हास्य संवरण पूर्वक निकुंजगृहसे बाहर चली गयीं, तब स्मरपरवशा श्रीराधा अपने प्रियतम श्रीकृष्णके मुखमण्डलका मनोहर कटाक्ष निक्षेपके द्वारा अवलोकन करने लगीं और उनकी लज्जा भी सलज्जभावसे वहाँसे दूर चली गयी। बालबोधिनी—ज्यों ही श्रीराधाने लता-निकुंजमें प्रवेश किया, सेज पर आसीन हुईं तभी सावधान सखियाँ समझ गईं कि अब उनके यहाँ रुकनेका कोई औचित्य ही नहीं है, उनकी उपस्थिति श्रीराधामाधवके मधुर मिलनमें बाधक बन सकती है। वे चतुर सखियाँ बहाना बनाने लगीं, कान आदि खुजलाने लगीं और मुस्कराते हुए लता-निकुंजसे बाहर चली गयीं। फूलोंकी शैया पर विराजमान श्रीराधा कामदेवके बाणोंसे वशीभूत हो श्रीकृष्णको ऐसे देखने लगीं मानो उन्हें पुनः स्मरके शरोंसे बींध रही हों। श्रीराधाकी ऐसी प्रगल्भता देखकर लता भी लज्जित हो गयीं और उस मृगनयनी श्रीराधाको छोड़कर सखियोंके समान स्वयं भी दूर चली गयीं। अब इस रति-व्यापारमें लाज भी कहाँ रहेगी, देखते-देखते श्रीराधाने श्रीकृष्णको प्राप्त कर लिया। प्रस्तुत श्लोकमें रसवद् अलंकार एवं शिखरिणी छन्द है।

एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३७१ सानन्दं नन्दसूनुर्दिशतु मितपरं सम्मदं मन्दमन्दं राधामाधाय बाह्रोर्विवरमनु दृढं पीडयन्प्रीतियोगात्। तुङ्गौ तस्या उरोजावतनु वरतनोर्निर्गतौ मा स्म भूतां पृष्ठं निर्भिद्य तस्माद्बहिरिति वलितग्रीवमालोकयन्वः ॥३॥ अनुवाद—नन्दपुत्र श्रीकृष्णने श्रीराधाको मन्द-मन्द अपनी बाहोंके अन्तरालमें रखा, प्रीतिपूर्वक उनका गाढ़ आलिङ्गन किया। पुनः ग्रीवाको घुमाकर ऐसे देखने लगे मानो श्रीराधाके उन्नत उरोज उनकी पीठको भेदकर बाहर न निकल जायें—ऐसे श्रीकृष्ण सभीका आनन्द विधान करें। बालबोधिनी—नन्दपुत्र श्रीगोपाल एवं श्रीराधाका मिलन हुआ। इस मिलनसे श्रीकृष्ण अतिशय आनन्दसे परिपूर्ण हो गये और धीरे-धीरे श्रीराधाको अपनी बाहोंके विवरमें भर लिया। श्रीराधा शिरीष कुसुमोंसे भी बहुत अधिक सुकोमल हैं, इसलिए उन्हें बहुत कोमलताके साथ गले लगाया। पुनः अत्यन्त प्रीतिपूर्वक श्रीराधाका गाढ़ आलिङ्गन किया। यहाँ ‘दृढं पीडयन्’ इस पदसे श्रीकृष्णका अतिशय अनुराग प्रकट हो रहा है। पुनः अपनी ग्रीवाको वलायित करके उन्हें देखने लगे कि कहीं श्रीराधाके तुङ्ग उरोज उनकी पीठको भेदकर बाहर न निकल जायें। इस प्रसंगमें श्रीराधाके उरोज पृष्ठका काठिन्य एवं तीक्ष्णत्व अभिव्यक्त हो रहा है। यहाँ श्रीराधाकी प्राकृतिक रूपसे अति रमणीयता एवं सौकुमार्यता निदर्शित हुई है—वे फूलोंसे भी अधिक कोमल है। प्रस्तुत श्लोकमें शृङ्गार रस, वैदर्भी रीति एवं प्रसाद गुण है। जयश्री-विन्यस्तैर्महित इव मन्दार कुसुमैः स्वयं सिन्दूरेण द्विप-रण-मुदा मुद्रित इव। भुजापीड़-क्रीड़ाहत-कुवलयापीड-करिणः प्रकीर्णासृग्बिन्दुर्जयति भुजदण्डो मुरजितः ॥४॥

३७२ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[तत्र तया अभिलाष-विशेषेण आलोच्यमानं श्रीकृष्णस्य भुजदण्डं स्मरन् तत्सौन्दर्य वर्णयति कविः]—भूजापीड- क्रीड़ाहत-कुवलयापीड़करिणः (भूजापीडेन बाहुभ्यां सम्यक् पीड़नेन क्रीड़या अवलीलया हतस्य कुवलयापीड़ाख्यस्य कंसकरिणः) प्रकीर्णासृग्विन्दुः (प्रकीर्णाः विक्षिप्ता लग्ना इति यावत् असृग्विन्दवः शोणितविन्दवः यत्र तादृशः) जयश्रीविन्यस्तैः (जयश्रिया विजयलक्ष्म्या विन्यस्तैः अर्पितैः) मन्दा-कुसुमैः (देवतरुपुष्पैः) महितः (अर्चितः) इव; [जयश्रीपूजितत्वेन हेतुना उत्प्रेक्षान्तरमाह]—द्विप-रण-मुदा (द्विपेण करिणा सह यः रणः संग्रामः तेन मुदा हर्षेण) स्वयं सिन्दूरेण मुद्रितः (राजितः) इव [एतादृशः] मुरजितः (मुरारेः श्रीहरेः) भुजदण्डः जयति [अतएव विप्रलम्भानन्तरप्राप्तानन्देन सहितो गोविन्दो यत्र सोऽयम् एकादशः सर्गः) ॥४॥ अनुवाद—बाहु-युद्धमें कुवलयापीड़ नामक हस्तीको मार देनेसे रुधिर (रक्त) बिन्दुओंसे सुशोभित, हाथीके साथ युद्धके उल्लासमें सिन्दूरसे चिह्नित, विजय-श्री द्वारा मन्दार पुष्पोंसे विभूषित मुरजित्कृष्णका विशाल भुजदण्ड जयजयकारको प्राप्त हो। बालबोधिनी—कवि जयदेव कहते हैं कि श्रीकृष्णका मंगलकारी भुजदण्ड आपका कल्याण करे, उनकी भुजाएँ सर्वोत्कृष्ट हैं, जगत-वन्दनीय हैं। वे मुरजित हैं। उन्होंने अपनी दण्डाकार भुजाओंसे मुर नामक दैत्यको परास्त कर दिया था। अपने इसी प्रचण्ड भुजदण्डकी क्रीड़ासे उन्होंने कंसके कुवलयापीड़ नामक हाथीको मार डाला था। उसको मारनेसे जो रक्तकी बूंदें उनकी भुजाओंपर पड़ गई थीं, उन्हें देखकर ऐसा लगता था मानो विजयलक्ष्मीने स्वयं ही पारिजातके फूलोंसे उनकी पूजा की हो। वे स्वयं भी उस हाथीको मारकर अत्यन्त प्रसन्न हुए थे। उनकी इसी प्रसन्नताने ही सिन्दूरका रूप धारण कर लिया था। ऐसा

एकादशः सर्गः-सामोद-दामोदरः ३७३ कहा जाता है कि उन्हें हाथीके उन्नत कुंभको देखकर श्रीराधाका स्मरण हो आया था। रक्त बिन्दुओंस सुशोभित उनकी भुजाएँ आनन्दरूपी सिन्दूरसे अलंकृत हो रही थीं अथवा विजयश्री द्वारा अर्पित किये गये मन्दार पुष्पोंसे समलंकृत हो रही थीं-ऐसा प्रचण्ड भुजदण्ड आप सबका मंगल-विधान करे। हे श्रीकृष्णके भुजदण्ड! आपकी जय हो, जय हो। प्रस्तुत श्लोकमें शिखरिणी छन्द है। अनुप्रास और उत्प्रेक्षा अलंकारकी संसृष्टि है। पाञ्चाली रीति, आरभटीवृत्ति तथा वीर रस है। सौन्दर्यैकनिधेरनङ्ग-ललना-लावण्य-लीलाजुषो राधाया हृदि पल्वले मनसिज क्रीड़ैकरङ्गस्थले रम्योरोजसरोजखेलनरसिकत्वादात्मनः ख्यापय- न्ध्यातुर्मानसराजहंसनिभतां देयान्मुकुन्दो मुदम् ॥५॥ इति श्रीजयदेवकृतौ श्रीगीतगोविन्दे राधिकामिलने सानन्द- दामोदरो-नामैकादशः सर्गः। अनुवाद-सौन्दर्यकी निधि, अनङ्गललना रतिके सदृश लावण्यमयी श्रीराधाके हृदय-सरोवरके मनोहर रङ्ग-स्थल स्तन-कमल पर क्रीड़ापरायण हुए एकाग्रचित्त, अपना ध्यान करने वालोंके मानस राजहंसत्वको ख्यापित करनेवाले श्रीमुकुन्द आपको आनन्द प्रदान करें। बालबोधिनी-श्रीमुकुन्द जो सभी मनुष्योंको क्लेशोंसे मुक्त कर उन्हें आनन्द प्रदान करते हैं। प्रस्तुत श्लोकमें पाठक तथा श्रोताओंको आशीर्वाद देते हुए कवि शिरोमणि जयदेवका कथन है कि श्रीराधा ही समग्र सौन्दर्यकी एकमात्र निधि हैं, उनका वक्षःस्थल श्रीकृष्णकी क्रीड़ाभूमि है। कविने श्रीराधाके वक्षःस्थलकी उपमा सरोवरसे की है। जिस तरह

३७४ श्रीगीतगोविन्दम् सरोवरमें कमल विकसित होते हैं, उसी प्रकार श्रीराधाके वक्षःस्थल-तड़ागमें दोनों स्तन ही मनोहर कमल हैं, जहाँ श्रीकृष्ण क्रीड़ा करनेवाले राजहंस हैं। ऐसे राजहंस श्रीकृष्णका जो लोग ध्यान करते हैं, उन ध्यान करनेवाले ध्याताओंके हृदय-स्थलमें विहार करनेवाले मानसरोवरके राजहंसके समान श्रीकृष्ण अपने सभी भक्तोंका मंगल विधान करें। प्रस्तुत श्लोकमें रूपक एवं आशीः अलंकार है और शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है। इस प्रकार सामोददामोदर नामक ग्यारहवें सर्गकी समाप्ति हुई।

द्वादशः सर्गः (सुप्रीत-पीताम्बरः) गतवति सखीवृन्देऽमन्दत्रपाभर-निर्भर- स्मरशरशाकूतस्फीतस्मितस्नपिताधराम् । सरसमनसं दृष्ट्वा राधा मुहुर्नवपल्लव- प्रसवशयने निक्षिप्ताक्षीमुवाच हरिः प्रियाम् ॥१॥ अन्वय-सखीवृन्दे (सहचरीसमूहे) गतवति [सति] हरिः मन्दत्रपाभर-निर्भर-स्मर-शर-वशाकूत-स्फीत-स्मितस्नपिताधरां (मन्दः शिथिलः यः त्रपाभरः लज्जातिशयः तेन निर्भरः अतिप्रवृद्धः स्मरशरः तद्वशो यः आकृतः अभिप्रायः तेन स्फीतं प्रवृद्धं यत् स्मितं मृदुमधुर-हसितं तेन स्नपितः अभिषिक्तः अधरः यस्याः तादृशीं) सरस-मनसं (अनुरागेण आर्द्रचित्तां) [तथा] मुहुः (पुनः पुनः) नवपल्लव-प्रसर-शयने (नव-पल्लवानां प्रसरः समूह एव शयनं तस्मिन्) निक्षिप्ताक्षीं (निक्षिप्ते अक्षिणी यस्याः तां) प्रियां (राधां) दृष्ट्वा उवाच ॥१॥ अनुवाद-सखीवृन्दके लता-कुञ्जसे बाहर चले जाने पर अत्यधिक लज्जासे परिपूर्ण श्रीराधा कामदेवके वशीभूत हो गयीं, उनके अधरोष्ठ स्मितसे सुशोभित हो गये, रतिक्रीड़ाके लिए अनुरागवती हो नव-पल्लवों एवं कुसुमोंसे रचित शय्याको पुनः-पुनः अवलोकन करने लगीं। अपनी प्रियाको ऐसा करते देखकर श्रीकृष्णने कहा- पद्यानुवाद- स्मर पूरित मन, लगी थिरकने दीठ 'शयन' की ओर तरल स्मित भी लगी भिगाने मधुर अधरकी कोर, लज्जासे हो उठे लाल जब गोरे मृदुल कपोल सखी गमन पर हरि राधासे बोल उठे दो बोल-

३७६ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—जब श्रीराधा निकुंज-लता-गृहमें केलि-विलास शय्याके समीप पहुँचीं तो सखियाँ स्वयंको बाधक मानकर विविध प्रकारके बहाने बनाकर चली गयीं। श्रीकृष्णने श्रीराधाको मनमें अत्यधिक लज्जित होते हुए देखा। कामकी परवशताके वशीभूत हो मन्द-मन्द मुस्कराहट श्रीराधाके होठों पर खेल रही थी, उत्सुकतासे पूर्ण पल्लवोंकी सेजकी ओर देखे जा रही थीं, कुछ बोल नहीं पा रही थीं, मन अनुरागसे भरा हुआ था, नवीन पल्लवों द्वारा रचित शय्या ही उनका अभिप्राय-सर्वस्व हो रहा था। श्रीराधाकी ऐसी मानसिक स्थितिको देखकर श्रीकृष्णने सानुराग उनसे कहा। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी छन्द है। इस सर्गमें स्वाधीनभर्तृका नायिका वर्णित हुई है। शय्याका पुनः-पुनरावलोकन श्रीराधाकी संभोगेच्छाका निदर्शन करता है। त्रयोविंश सन्दर्भ गीतम् ॥२३॥ विभासरागेकतालीतालाभ्यां गीयते ॥प्रबन्धः ॥२३॥ गीतगोविन्द काव्यके इस २३वें प्रबन्धको विलास राग तथा एकताली तालसे गाया जाता है। किसलय-शयन-तले कुरु कामिनि! चरण-नलिन-विनिवेशम्। तव पद-पल्लव-वैरि पराभवमिदमनुभवतु सुवेशम् ॥१॥ क्षणमधुना नारायणमनुगतमनुसर राधिके! ध्रुवपदम् अन्वय—अयि कामिनि [मत्पूजा त्वय्यस्तीति कामिनीशब्दः प्रयुक्तः] किशलय-शयन-तले (नवपल्लवशय्यायां) चरण-नलिन- विनिवेशं (चरण-कमलयोर्विन्यासं) कुरु [पूजायां प्रथमाङ्गमासनम् अङ्गीकुरु] इदं (तरुण-पल्लवशयनं) सुवेशं (तत्तद्गुणैः शोभमानमपि) तव पद-पल्लव-वैरि (पदपल्लवस्य शत्रुभूतम्

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३७७ अरुणतादिभिः गुणैः साम्यकाङ्क्षया वैरित्वं ज्ञेयं) [अतः अस्य शिरसि तव पदपल्लवस्य अवस्थापनात्] पराभवम् अनुभवतु, अयि राधिके अधुना नारायणं (नारीणां समूहो नारं; नाराणाम् अयनम् स्त्रीसमूहानाम् आश्रयं) अनुगतं (त्वदेकपरं) [बहुवल्लभमपि त्वदेकनिष्ठमिति भावः]; [माम्] क्षणम् अनुभज (सेवस्व) ॥१ ॥ अनुवाद—हे कामिनि ! किसलयोंसे बनी शय्या पर अपने चरण-नलिनको न्यस्त करो। तुम्हारे पद-पल्लवोंकी वैरिणी यह शय्या अब पराभवका अनुभव करे। हे राधिके ! मुहूर्त्त-मात्रके लिए आप मुझ नारायणका अनुसरण करें। पद्यानुवाद— मानिनि! अपना मान बिसारो। नव किसलय-शय्या पर सुन्दरि! पद-पद्मोंको धारो। और अरुणिमासे पल्लवके अहंभावको मारो॥ बालबोधिनी—श्रीहरि श्रीराधासे कहने लगे—हे कामिनि ! अपने चरण-कमल इस पल्लवकी सेज पर स्थापित करो। ये पल्लव तुम्हारे पद-पल्लवोंसे वैर रखते हैं। अपने पैरोंसे इन्हें प्रताड़ित करो, जिससे ये अपनी हारको अनुभूत कर लें। शत्रु अपने शत्रुको पराजित कर उसे अपने पैरोंसे रोंद ही तो डालता है। हे प्रिये ! अब तुम मेरा अनुसरण करो, तुम्हारे दर्शनोत्सवसे मैं अत्यधिक आनन्दित हो रहा हूँ। अब क्षण भर तुम्हारे साथ सम्भोगोत्सवसे मुझे आनन्दित होने दो। अब ऐसा पल आ गया है कि तुम अपने अनुगत नारायणके साथ विलसो। रस-सृष्टिकी भूमिका बनाते हुए श्रीकृष्ण कहने लगे—मैं नारायण हूँ। इस प्रसंगमें नारायणका अभिप्राय यह है कि जो नार अर्थात् जलमें निवास करता है, जो जनोंके आश्रय-स्वरूप हैं। जिस प्रकार कोई सन्तप्त व्यक्ति जलाशयमें जल-क्रीड़ा कर आनन्दकी अनुभूति करता है, उसी प्रकार तुम भी कामसंतप्ता हो, मेरे प्रेम-सागरमें

मानिनि! अपना मान बिसारो।

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३७९ जलक्रीड़ाके समान रतिकेलिका अनुभवकर आनन्द प्राप्त करो और मेरी भी शीतलताका विधान करो। प्रस्तुत श्लोकमें तल्प पर ‘पदपल्लवन्यास’ पदसे करणविशेष सूचित हुआ है। कर-कमलेन करोमि चरण-महमागमितासि विदूरम्। क्षणमुपकुरु शयनोपरि मामिव नूपुरमनुगतिशूरम्॥ क्षणमधुना....॥२॥ अन्वय—[तदारोहणेन कथं त्वदनुभजनं स्यादित्यत आह]— [अयि प्रिये] [अहम् आत्मनः] करकमलेन [तव] चरणमहं (चरणयोः महं पूजां) करोमि (संवाहयामीत्यर्थः) [यतः] [त्वं] विदूरम् (अतिदूरम्) आगमितासि (आनीतासि) [मयेति शेषः]; [दूरागतस्य पादसंवाहनमुचितमितिभावः]; [तदर्थं] क्षणं शयनोपरि (शय्यायां) अनुगतिशूरं (अनुगतौ अनुगमने सेवायां शूरं निपुणं) नूपुरमिव माम् उपकुरु (अङ्गीकुरु) [अनुगतस्य पाद-लग्नस्य उपकाराचरणं युक्तमेवेत्यर्थः]॥२॥ अनुवाद—हे प्रिये ! आप बहुत दूरसे चलकर आयी हैं। मैं अपने कर-कमलोंसे आपके चरणारविन्दोंका संवाहन करता हूँ। अपने नूपुरका अनुसरण करनेवाले मुझ शूर पर भी तुम इस शय्याके ऊपर क्षणभर उपकार करो। पद्यानुवाद— दूर देशसे थक आई हो, कर कमलोंसे अपने पद सहलाकर श्रम हर लूँगा (क्यों विहँसी चल नयने ?) दूँ उतार पायल, क्षण भर तो शैया पर ढिग मेरे। बैठो प्रिय! बतरससे हिय हो शीतल आज सबेरे॥ बालबोधिनी—श्रीकृष्ण कहते हैं—राधे! तुम बड़ी दूरसे चलकर आई हो, आओ, मैं अपने हाथोंसे तुम्हारे चरण-कमलोंको दबा दूँ, मैं इन चरणोंकी पूजा करता हूँ। इन नूपुरों पर उपकार कर जैसे तुम इनको धारण करती हो, उसी प्रकार

३८० श्रीगीतगोविन्दम् मुझ पर भी उपकार करो-इस शय्या पर। जिस प्रकार ये नूपुर सदा-सर्वदा तुम्हारा अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार मैं भी नित्य-निरन्तर तुम्हारा अनुसरण करता हूँ। अतः तुम्हारे द्वारा उपकृत किये जानेकी योग्यता मुझमें है। मैं भी तुम्हारे अनुग्रहका पात्र हूँ। वदन-सुधानिधि-गलितममृतमिव रचय वचनमनुकूलम्। विरहमिवापनयामि पयोधर-रोधकमुरसि दुकूलम् ॥ क्षणमधुना.... ॥३ ॥ अन्वय-[अनुज्ञां बिना पूजा न शुभावहा इति अनुज्ञां प्रार्थयते]-अयि प्रेयसि! वदन-सुधानिधि-गलितम् (वदनमेव सुधानिधिः चन्द्रः तस्मात् गलितम् निःसृतम्) अमृतम् इव अनुकूलं (अनुरागात्मकं) [अनुकूलमेव वचनम् अमृतवद्द्रवतीति भावः] वचनं रचय (वद); [ननु किमेतावता तवेप्सितं सेत्स्यतीत्याह] [अहं च] पयोधर-रोधकं (स्तनावरकं, स्तनाश्लेष- वाधकमित्यर्थः) दुकूलम् (वसनम्) उरसि (वक्षसि; अत्र पञ्चम्यर्थे सप्तमी) विरहमिव अपनयामि (अपसारयामि) [यथा विरहेण पयोधरदर्शनं विच्छिद्यते दुकूलेन; अतस्तत् दूरीकृत्य विरहव्यथामपि निवारयामि] ॥३ ॥ अनुवाद-हे राधे! अपने मुखसुधानिधिसे अमृततुल्य अनुकूल वचन कहिये। मिलनमें बाधक स्वरूप विरहके समान तुम्हारे पयोधर-स्थल पर स्थित वस्त्रको मैं हटाना चाहता हूँ। पद्यानुवाद- उर-दुकूल कर दूर कुचोंकी आलिंगन-आतुरता। अन्त करो भुज-पाश समाकर देवि! अखिल व्याकुलता ॥ विरह-अनलसे दग्ध देह यह नष्ट हुए सब सपने। अधर-सुधा-रससे जीवन दो इस अनुचरको अपने ॥

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३८१ बालबोधिनी—हे राधे ! अपने मुखसे रति उत्पन्न करनेवाले मनोहारी अनुकूल वचन कहिए। तुम्हारा मुख चन्द्रमाके समान है। जिस प्रकार चन्द्रमासे अमृत निःसृत होता है, उसी प्रकार तुम भी अपने मुखेन्दुसे सुधा-धारा वर्षण करो। सुरत-क्रीड़ा अनुकूल मीठी-मीठी बातें बोलो। मैं तुम्हारे विरहसे तापित हूँ, परस्पर उपमान-उपमेय भावसे कहते हैं कि दुकूलके समान विरहको हटाता हूँ, विरहके समान दुकूलको हटाता हूँ। जैसे विरह हम दोनोंके मिलनमें बाधक बनता है, उसी प्रकारसे यह तुम्हारे वक्षःस्थल पर विद्यमान दुकूल भी हम दोनोंके मिलनमें बाधक है। अतः इस बाधक या अवरोधकको हटानेकी मुझे अनुमति दो। यह दुकूल पयोधरोंका रोधक है। विरहमें कामिनियोंके पयोधरोंकी वृद्धि नहीं होती, उसी प्रकार वस्त्रसे आवृत पयोधरोंकी भी वृद्धि नहीं होती। अतः तुम्हारे स्तनोंके विकासको रोकनेवाले विरह रूप आवरणको मैं हटा देता हूँ। प्रिय-परिरम्भण-रभस-वलितमिव पुलकितमति दुरवापम्। मदुरसि कुचकलशं विनिवेशय शोषय मनसिज-तापम् ॥ क्षणमधुना.... ॥४॥ अन्वय—[ततो वक्त्रमवलोकयन्तीं प्रति व्याकुल सन्नाह]—[अयि प्रियतमे] मदुरसि (मम उरसि वक्षोदेशे) प्रिय-परिरम्भण-रभस-वलितमिव (प्रियस्य कान्तस्य मम परिरम्भणाय आलिङ्गनाय यो रभसः औत्सुक्यं तेन आलिङ्गनावेशेन इत्यर्थः वलितम् उच्छलितमिव) पुलकितं (रोमाञ्चितं) [कस्यचित् वृथार्त्तावलोकात् करुणः तदार्त्तिशमनाय पुलकितो भवति तद्वदयमपीत्यर्थः] अतिदुरवापं (अतिदुर्लभं) कुचकलसं (स्तनकुम्भं) विनिवेशय (स्थापय) [दुरापस्य हृद्येव धारण-योग्यत्वादिति भावः]; [तेनच मम] मनसिज-तापं (मदनसन्तापं) शोषय (खण्डय, निवारय इत्यर्थः) [रसायनार्पणात् तापोपशान्तिर्भवत्येवेत्यर्थः] ॥४॥

३८२ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—हे प्रिये ! प्रियतमके परिरम्भणके लिए सन्नद्ध तथा हर्ष-रोमांचसे पुलकित, दुष्प्राप्य इन कुच-कलशोंको मेरे वक्षःस्थल पर रखकर मेरे मनसिज तापको दूर कीजिए। बालबोधिनी—हे राधे! मेरे हृदय पर अपने कुच-कलशोंको धारण करा दो, जैसे मानो मंगलवेदी पर कुच-कलश रख रही हो। इस तरह मेरे मनसिज तापको शोषित कर डालो। कलश सन्निहित करने पर ताप तो चला ही जाता है। तुम्हारे कुचकलश पुलकित और रोमांचित हो रहे हैं। तुम्हारे अनुग्रहके बिना इनको प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। प्रियतमके आलिंगनके लिए ये अति सन्नद्ध एवं तत्पर हो रहे हैं। अतः इन्हें मेरे हृदय पर रखकर मेरे काम-सन्तापको दूर कर दीजिए। अधर-सुधारसमुपनय भामिनि ! जीवय मृतमिव दासम्। त्वयि विनिहित-मनसं विरहानलदग्धवपुषमविलासम् ॥ क्षणमधुना.... ॥५॥ अन्वय—[अन्यथा मे दशमी दशा स्यादित्यत आह]—अयि भामिनि (अभिमानवति) [वक्रदृष्ट्या अवलोकनात् भामिनीत्युक्तम्] अधर-सुधा-रसम् (अधरामृतम्) उपनय (देहि); त्वयि विनिहितमनसं (समर्पितचित्तम्; अनन्यगतिकमित्यर्थः) विरहानल- दग्धवपुषम् [अतएव] अविलासं (विलासरहितं निरानन्दमिति यावत्) मृतमिव (मृतप्रायं) दासं (किङ्करं) जीवय (गतजीवितमिव माम् अमृतं दत्त्वा सजीवं कुरु इति भावः) ॥५॥ अनुवाद—हे भामिनि ! तुममें ही निविष्ट मनवाले, विरहानलसे दग्ध, विलासरहित, मृतवत् मुझ दासको अपनी अधर-सुधा-रसका पान कराकर जीवित करो। बालबोधिनी—हे भामिनि ! तुम्हारे चरणोंकी ही परिचर्या करनेवाले इस दास पर तुम कृपा कर दो। अपने मानको त्याग दो, कोपको छोड़ दो। तुम्हारा चिन्तन करते-करते मैं

द्वादशः सर्गः- सुप्रीत-पीताम्बरः ३८३ विरहकी अग्निमें संतप्त हो रहा हूँ। तुम्हारा यह सेवक प्रायः मृतवत् हो गया है। अतः अपनी अधरसुधासे मुझ दासमें नये प्राणोंका संचार करो, मुझ निश्चेष्टको पुनः सक्रिय करो, सप्राण करो। मृत व्यक्ति अमृतका पान करके जीवित हो उठता है, मेरा मन तो तुममें ही लगा हुआ है, तुममें ही आसक्त है, विलास रहित विरहरूप अग्निसे दग्ध मुझे अधरामृतसे सिंचित करो। शशिमुखि! मुखरय मणिरशनागुणमनुगुणकण्ठनिनादम्। श्रुति-युगले पिकरुतविकले पुर शमय चिरादवसादम् ॥ क्षणमधुना.... ॥६ ॥ अन्वय- [मौनेन तत्सम्मतिमालक्ष्य लोभादन्यदपि प्रार्थयते]- अयि शशिमुखि (चन्द्रानने) अनुगुणकण्ठनिनादम् (अनुगुणः सदृशः कण्ठस्य निनादः ध्वनि यस्य तादृशं, तव कण्ठस्वरतुल्यं) मणिरसनागुणं (रत्नमय काञ्चीदामं) मुखरय (मुखरीकुरु; प्रार्थना-विशेषोऽयं) पिकरुत-विकले (पिकानां कोकिलानां रुतेन रवेण विकले व्याकुले; विरहस्योद्दीपकत्वादिति भावः) श्रुति- पुटयुगले (कर्णद्वये); चिरात् (चिरकालीनमित्यर्थः) अवसादं (अवसन्नतां) शमय (नाशय) ॥६ ॥ अनुवाद-हे विधुमुखी! अपनी करधनीकी मणियोंको मुखरित करो, उसीके समान अपना कण्ठ निनाद करो। इस प्रकारकी कोकिल-ध्वनिसे चिरकालसे अवसादित मेरे श्रुतियुगलको शमित करो। पद्यानुवाद- मधु किंकिणि-ध्वनिसे पूरित हों युगल कान ये मेरे। पिक-रवसे पीड़ित थे जो अति विरह-समयमें तेरे॥ बालबोधिनी-हे चन्द्रानने! तुम तो अमृत निस्पन्दन चन्द्रमा ही तो हो। अपनी मणिकी करधनीको अपने कण्ठ-स्वरके साथ इस प्रकार मुखरित करो कि विपरीत