भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 413, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 413

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३८१ बालबोधिनी—हे राधे ! अपने मुखसे रति उत्पन्न करनेवाले मनोहारी अनुकूल वचन कहिए। तुम्हारा मुख चन्द्रमाके समान है। जिस प्रकार चन्द्रमासे अमृत निःसृत होता है, उसी प्रकार तुम भी अपने मुखेन्दुसे सुधा-धारा वर्षण करो। सुरत-क्रीड़ा अनुकूल मीठी-मीठी बातें बोलो। मैं तुम्हारे विरहसे तापित हूँ, परस्पर उपमान-उपमेय भावसे कहते हैं कि दुकूलके समान विरहको हटाता हूँ, विरहके समान दुकूलको हटाता हूँ। जैसे विरह हम दोनोंके मिलनमें बाधक बनता है, उसी प्रकारसे यह तुम्हारे वक्षःस्थल पर विद्यमान दुकूल भी हम दोनोंके मिलनमें बाधक है। अतः इस बाधक या अवरोधकको हटानेकी मुझे अनुमति दो। यह दुकूल पयोधरोंका रोधक है। विरहमें कामिनियोंके पयोधरोंकी वृद्धि नहीं होती, उसी प्रकार वस्त्रसे आवृत पयोधरोंकी भी वृद्धि नहीं होती। अतः तुम्हारे स्तनोंके विकासको रोकनेवाले विरह रूप आवरणको मैं हटा देता हूँ। प्रिय-परिरम्भण-रभस-वलितमिव पुलकितमति दुरवापम्। मदुरसि कुचकलशं विनिवेशय शोषय मनसिज-तापम् ॥ क्षणमधुना.... ॥४॥ अन्वय—[ततो वक्त्रमवलोकयन्तीं प्रति व्याकुल सन्नाह]—[अयि प्रियतमे] मदुरसि (मम उरसि वक्षोदेशे) प्रिय-परिरम्भण-रभस-वलितमिव (प्रियस्य कान्तस्य मम परिरम्भणाय आलिङ्गनाय यो रभसः औत्सुक्यं तेन आलिङ्गनावेशेन इत्यर्थः वलितम् उच्छलितमिव) पुलकितं (रोमाञ्चितं) [कस्यचित् वृथार्त्तावलोकात् करुणः तदार्त्तिशमनाय पुलकितो भवति तद्वदयमपीत्यर्थः] अतिदुरवापं (अतिदुर्लभं) कुचकलसं (स्तनकुम्भं) विनिवेशय (स्थापय) [दुरापस्य हृद्येव धारण-योग्यत्वादिति भावः]; [तेनच मम] मनसिज-तापं (मदनसन्तापं) शोषय (खण्डय, निवारय इत्यर्थः) [रसायनार्पणात् तापोपशान्तिर्भवत्येवेत्यर्थः] ॥४॥