गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८२ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—हे प्रिये ! प्रियतमके परिरम्भणके लिए सन्नद्ध तथा हर्ष-रोमांचसे पुलकित, दुष्प्राप्य इन कुच-कलशोंको मेरे वक्षःस्थल पर रखकर मेरे मनसिज तापको दूर कीजिए। बालबोधिनी—हे राधे! मेरे हृदय पर अपने कुच-कलशोंको धारण करा दो, जैसे मानो मंगलवेदी पर कुच-कलश रख रही हो। इस तरह मेरे मनसिज तापको शोषित कर डालो। कलश सन्निहित करने पर ताप तो चला ही जाता है। तुम्हारे कुचकलश पुलकित और रोमांचित हो रहे हैं। तुम्हारे अनुग्रहके बिना इनको प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। प्रियतमके आलिंगनके लिए ये अति सन्नद्ध एवं तत्पर हो रहे हैं। अतः इन्हें मेरे हृदय पर रखकर मेरे काम-सन्तापको दूर कर दीजिए। अधर-सुधारसमुपनय भामिनि ! जीवय मृतमिव दासम्। त्वयि विनिहित-मनसं विरहानलदग्धवपुषमविलासम् ॥ क्षणमधुना.... ॥५॥ अन्वय—[अन्यथा मे दशमी दशा स्यादित्यत आह]—अयि भामिनि (अभिमानवति) [वक्रदृष्ट्या अवलोकनात् भामिनीत्युक्तम्] अधर-सुधा-रसम् (अधरामृतम्) उपनय (देहि); त्वयि विनिहितमनसं (समर्पितचित्तम्; अनन्यगतिकमित्यर्थः) विरहानल- दग्धवपुषम् [अतएव] अविलासं (विलासरहितं निरानन्दमिति यावत्) मृतमिव (मृतप्रायं) दासं (किङ्करं) जीवय (गतजीवितमिव माम् अमृतं दत्त्वा सजीवं कुरु इति भावः) ॥५॥ अनुवाद—हे भामिनि ! तुममें ही निविष्ट मनवाले, विरहानलसे दग्ध, विलासरहित, मृतवत् मुझ दासको अपनी अधर-सुधा-रसका पान कराकर जीवित करो। बालबोधिनी—हे भामिनि ! तुम्हारे चरणोंकी ही परिचर्या करनेवाले इस दास पर तुम कृपा कर दो। अपने मानको त्याग दो, कोपको छोड़ दो। तुम्हारा चिन्तन करते-करते मैं