गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 415, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादशः सर्गः- सुप्रीत-पीताम्बरः ३८३ विरहकी अग्निमें संतप्त हो रहा हूँ। तुम्हारा यह सेवक प्रायः मृतवत् हो गया है। अतः अपनी अधरसुधासे मुझ दासमें नये प्राणोंका संचार करो, मुझ निश्चेष्टको पुनः सक्रिय करो, सप्राण करो। मृत व्यक्ति अमृतका पान करके जीवित हो उठता है, मेरा मन तो तुममें ही लगा हुआ है, तुममें ही आसक्त है, विलास रहित विरहरूप अग्निसे दग्ध मुझे अधरामृतसे सिंचित करो। शशिमुखि! मुखरय मणिरशनागुणमनुगुणकण्ठनिनादम्। श्रुति-युगले पिकरुतविकले पुर शमय चिरादवसादम् ॥ क्षणमधुना.... ॥६ ॥ अन्वय- [मौनेन तत्सम्मतिमालक्ष्य लोभादन्यदपि प्रार्थयते]- अयि शशिमुखि (चन्द्रानने) अनुगुणकण्ठनिनादम् (अनुगुणः सदृशः कण्ठस्य निनादः ध्वनि यस्य तादृशं, तव कण्ठस्वरतुल्यं) मणिरसनागुणं (रत्नमय काञ्चीदामं) मुखरय (मुखरीकुरु; प्रार्थना-विशेषोऽयं) पिकरुत-विकले (पिकानां कोकिलानां रुतेन रवेण विकले व्याकुले; विरहस्योद्दीपकत्वादिति भावः) श्रुति- पुटयुगले (कर्णद्वये); चिरात् (चिरकालीनमित्यर्थः) अवसादं (अवसन्नतां) शमय (नाशय) ॥६ ॥ अनुवाद-हे विधुमुखी! अपनी करधनीकी मणियोंको मुखरित करो, उसीके समान अपना कण्ठ निनाद करो। इस प्रकारकी कोकिल-ध्वनिसे चिरकालसे अवसादित मेरे श्रुतियुगलको शमित करो। पद्यानुवाद- मधु किंकिणि-ध्वनिसे पूरित हों युगल कान ये मेरे। पिक-रवसे पीड़ित थे जो अति विरह-समयमें तेरे॥ बालबोधिनी-हे चन्द्रानने! तुम तो अमृत निस्पन्दन चन्द्रमा ही तो हो। अपनी मणिकी करधनीको अपने कण्ठ-स्वरके साथ इस प्रकार मुखरित करो कि विपरीत