गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८४ श्रीगीतगोविन्दम् रति-कालमें वे तुम्हारे कण्ठ-स्वरके साथ ताल देने लगें। मेरे श्रोत्र-युगल जो कोयलकी कूक सुन-सुनकर खिन्न हो रहे थे, उस उद्दीपनसे अतृप्त हो रहे थे, उनमें संगीत समा जाने दो और चिरकालसे सञ्चित इस विरहके अवसादको शमित कर दो। पिक-रव विरहियोंके लिए दुःश्रव होता ही है। मामतिविफलरुषा विकलीकृतमवलोकितुमधुनेदम्। मीलतिलज्जितमिव नयनं तव विरमविसृजसि रतिखेदम्॥ क्षणमधुना.... ॥७॥ अन्वय—[मयि अकारण-कोपे तव नयनमेव प्रमाणमिति प्रार्थ्यते]—[अयि प्रेयसि] इदं तव नयनम् अधुना अति विफलरुषा (मानापरनाम्ना अकारण-कोपेन) विकलीकृतं (नितरां क्लेशितं) माम् अवलोकितुं (द्रष्टुं) लज्जितं (सलज्जमिव) मीलति (मुद्रितं भवति) [अन्योऽपि यः कश्चित् निरपराधं कुपित्वा व्याकुलीकरोति सोऽपि तन्मुखावलोकने लज्जितो भवतीत्यभिप्रायः]; तर्हि अधुना] विरम (रोषात् निवर्त्तस्व) [ततश्च] रतिखेदं (सुरत-वाम्यं) विसृज (त्यज) ॥७॥ अनुवाद—हे मानमयी! तुम अकारण ही मेरे प्रति अभिमान कर व्याकुल हो रही हो, देखो तुम्हारे लोचनद्वय मेरी ओर देखकर अर्द्धनिमीलित हो रहे हैं। अब तुम मेरे प्रति वाम्यभावका परित्याग करो। पद्यानुवाद— लाज भरे ये नेत्र देखने खुलते हैं—झप जाते। मान निगोड़ेके कारण हम, दो न एक हो पाते॥ बालबोधिनी—हे राधे! तुम्हारी ये आँखें सदैव व्यर्थके क्रोधसे मुझे ऐसे देखती थीं कि मैं व्यर्थ ही व्याकुल हो जाता था। मुझे विकल करनेके लिए तुम मेरे प्रति अकारण रोष दिखाया करती थीं। तुम्हारी इस उत्तेजनासे तो मैं