गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३८५ टूक-टूक हो जाया करता था, देखो अब तुम्हारी दृष्टि मुझ पर प्रेम वर्षण कर रही है, क्रोधसे भरी दृष्टि अब स्वयं ही सलज्ज हो रही हैं, अब इन नेत्रोंके निरर्थक उन्मीलनका परित्याग कर दो। मुझ पर प्रसन्न हो जाओ और उत्साहसे भरकर रतिजन्य खेदका परित्याग कर दो। श्रीजयदेव-भणितमिदमनुपद-निगदितमधुरिपु-मोदम् । जनयतु रसिकजनेषु मनोरम रतिरस भाव-विनोदम् ॥ क्षणमधुना.... ॥८॥ अन्वय—अनुपद-निगदित-मधुरिपु-मोदं (अनुपदं प्रतिपदं निगदितः विवृतः मधुरिपोः श्रीकृष्णस्य मोदः हर्षः यत्र तादृशं) इदं श्रीजयदेव भणितं (श्रीजयदेव कथित गीतं) रसिकजनेषु (श्रीकृष्णभक्तजनविशेषेषु) मनोरम-रतिरसभावविनोदं (मनोरमे रतिरसे यो भावः तदास्वादरूपः तेन यो विनोदः हर्षः तं) जनयतु ॥८॥ अनुवाद—पद-पद पर मधुरिपु श्रीकृष्णके आनन्द विनोदका वर्णन करनेवाले जयदेव कवि द्वारा रचित यह गीत रसिक जनोंमें मनोरम-रति-रस-भाव विनोदको उत्पन्न करे। पद्यानुवाद— माधव कर मनुहार प्रियासे रति-विलास-रस भूले। जन-रञ्जक मधुमय लीला गा कवि 'जय' मनमें फूले ॥ बालबोधिनी—प्रस्तुत अष्टपदी 'मधुरिपुमोदविद्याधर-लीला' में कवि जयदेवने श्रीमूसूदनके प्रमोद-आनन्द-वर्द्धनका निरूपण किया है। यह गीत रसिकोंमें मनोहर रति-रस-आनन्दकी सृष्टि करे। रसिकजनोंमें रति-रस अथवा केलि-रसकी अनुपमता एवं उज्ज्वलताकी सर्वश्रेष्ठता अंगीकारकी जाती है। इसी राग-रसको ही महामहिम शृङ्गार-रसके नामसे ख्यापित किया गया है। इस प्रकार यह प्रबन्ध श्रीपति-श्रीकृष्णका प्रीतिकारक है, रति-रसके भावको विकसित करनेवाला है, संभोग-शृङ्गारको उन्मीलित करनेवाला है।