गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० श्रीगीतगोविन्दम् मुझ पर भी उपकार करो-इस शय्या पर। जिस प्रकार ये नूपुर सदा-सर्वदा तुम्हारा अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार मैं भी नित्य-निरन्तर तुम्हारा अनुसरण करता हूँ। अतः तुम्हारे द्वारा उपकृत किये जानेकी योग्यता मुझमें है। मैं भी तुम्हारे अनुग्रहका पात्र हूँ। वदन-सुधानिधि-गलितममृतमिव रचय वचनमनुकूलम्। विरहमिवापनयामि पयोधर-रोधकमुरसि दुकूलम् ॥ क्षणमधुना.... ॥३ ॥ अन्वय-[अनुज्ञां बिना पूजा न शुभावहा इति अनुज्ञां प्रार्थयते]-अयि प्रेयसि! वदन-सुधानिधि-गलितम् (वदनमेव सुधानिधिः चन्द्रः तस्मात् गलितम् निःसृतम्) अमृतम् इव अनुकूलं (अनुरागात्मकं) [अनुकूलमेव वचनम् अमृतवद्द्रवतीति भावः] वचनं रचय (वद); [ननु किमेतावता तवेप्सितं सेत्स्यतीत्याह] [अहं च] पयोधर-रोधकं (स्तनावरकं, स्तनाश्लेष- वाधकमित्यर्थः) दुकूलम् (वसनम्) उरसि (वक्षसि; अत्र पञ्चम्यर्थे सप्तमी) विरहमिव अपनयामि (अपसारयामि) [यथा विरहेण पयोधरदर्शनं विच्छिद्यते दुकूलेन; अतस्तत् दूरीकृत्य विरहव्यथामपि निवारयामि] ॥३ ॥ अनुवाद-हे राधे! अपने मुखसुधानिधिसे अमृततुल्य अनुकूल वचन कहिये। मिलनमें बाधक स्वरूप विरहके समान तुम्हारे पयोधर-स्थल पर स्थित वस्त्रको मैं हटाना चाहता हूँ। पद्यानुवाद- उर-दुकूल कर दूर कुचोंकी आलिंगन-आतुरता। अन्त करो भुज-पाश समाकर देवि! अखिल व्याकुलता ॥ विरह-अनलसे दग्ध देह यह नष्ट हुए सब सपने। अधर-सुधा-रससे जीवन दो इस अनुचरको अपने ॥