भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३७९ जलक्रीड़ाके समान रतिकेलिका अनुभवकर आनन्द प्राप्त करो और मेरी भी शीतलताका विधान करो। प्रस्तुत श्लोकमें तल्प पर ‘पदपल्लवन्यास’ पदसे करणविशेष सूचित हुआ है। कर-कमलेन करोमि चरण-महमागमितासि विदूरम्। क्षणमुपकुरु शयनोपरि मामिव नूपुरमनुगतिशूरम्॥ क्षणमधुना....॥२॥ अन्वय—[तदारोहणेन कथं त्वदनुभजनं स्यादित्यत आह]— [अयि प्रिये] [अहम् आत्मनः] करकमलेन [तव] चरणमहं (चरणयोः महं पूजां) करोमि (संवाहयामीत्यर्थः) [यतः] [त्वं] विदूरम् (अतिदूरम्) आगमितासि (आनीतासि) [मयेति शेषः]; [दूरागतस्य पादसंवाहनमुचितमितिभावः]; [तदर्थं] क्षणं शयनोपरि (शय्यायां) अनुगतिशूरं (अनुगतौ अनुगमने सेवायां शूरं निपुणं) नूपुरमिव माम् उपकुरु (अङ्गीकुरु) [अनुगतस्य पाद-लग्नस्य उपकाराचरणं युक्तमेवेत्यर्थः]॥२॥ अनुवाद—हे प्रिये ! आप बहुत दूरसे चलकर आयी हैं। मैं अपने कर-कमलोंसे आपके चरणारविन्दोंका संवाहन करता हूँ। अपने नूपुरका अनुसरण करनेवाले मुझ शूर पर भी तुम इस शय्याके ऊपर क्षणभर उपकार करो। पद्यानुवाद— दूर देशसे थक आई हो, कर कमलोंसे अपने पद सहलाकर श्रम हर लूँगा (क्यों विहँसी चल नयने ?) दूँ उतार पायल, क्षण भर तो शैया पर ढिग मेरे। बैठो प्रिय! बतरससे हिय हो शीतल आज सबेरे॥ बालबोधिनी—श्रीकृष्ण कहते हैं—राधे! तुम बड़ी दूरसे चलकर आई हो, आओ, मैं अपने हाथोंसे तुम्हारे चरण-कमलोंको दबा दूँ, मैं इन चरणोंकी पूजा करता हूँ। इन नूपुरों पर उपकार कर जैसे तुम इनको धारण करती हो, उसी प्रकार