गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३७७ अरुणतादिभिः गुणैः साम्यकाङ्क्षया वैरित्वं ज्ञेयं) [अतः अस्य शिरसि तव पदपल्लवस्य अवस्थापनात्] पराभवम् अनुभवतु, अयि राधिके अधुना नारायणं (नारीणां समूहो नारं; नाराणाम् अयनम् स्त्रीसमूहानाम् आश्रयं) अनुगतं (त्वदेकपरं) [बहुवल्लभमपि त्वदेकनिष्ठमिति भावः]; [माम्] क्षणम् अनुभज (सेवस्व) ॥१ ॥ अनुवाद—हे कामिनि ! किसलयोंसे बनी शय्या पर अपने चरण-नलिनको न्यस्त करो। तुम्हारे पद-पल्लवोंकी वैरिणी यह शय्या अब पराभवका अनुभव करे। हे राधिके ! मुहूर्त्त-मात्रके लिए आप मुझ नारायणका अनुसरण करें। पद्यानुवाद— मानिनि! अपना मान बिसारो। नव किसलय-शय्या पर सुन्दरि! पद-पद्मोंको धारो। और अरुणिमासे पल्लवके अहंभावको मारो॥ बालबोधिनी—श्रीहरि श्रीराधासे कहने लगे—हे कामिनि ! अपने चरण-कमल इस पल्लवकी सेज पर स्थापित करो। ये पल्लव तुम्हारे पद-पल्लवोंसे वैर रखते हैं। अपने पैरोंसे इन्हें प्रताड़ित करो, जिससे ये अपनी हारको अनुभूत कर लें। शत्रु अपने शत्रुको पराजित कर उसे अपने पैरोंसे रोंद ही तो डालता है। हे प्रिये ! अब तुम मेरा अनुसरण करो, तुम्हारे दर्शनोत्सवसे मैं अत्यधिक आनन्दित हो रहा हूँ। अब क्षण भर तुम्हारे साथ सम्भोगोत्सवसे मुझे आनन्दित होने दो। अब ऐसा पल आ गया है कि तुम अपने अनुगत नारायणके साथ विलसो। रस-सृष्टिकी भूमिका बनाते हुए श्रीकृष्ण कहने लगे—मैं नारायण हूँ। इस प्रसंगमें नारायणका अभिप्राय यह है कि जो नार अर्थात् जलमें निवास करता है, जो जनोंके आश्रय-स्वरूप हैं। जिस प्रकार कोई सन्तप्त व्यक्ति जलाशयमें जल-क्रीड़ा कर आनन्दकी अनुभूति करता है, उसी प्रकार तुम भी कामसंतप्ता हो, मेरे प्रेम-सागरमें