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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३७७ अरुणतादिभिः गुणैः साम्यकाङ्क्षया वैरित्वं ज्ञेयं) [अतः अस्य शिरसि तव पदपल्लवस्य अवस्थापनात्] पराभवम् अनुभवतु, अयि राधिके अधुना नारायणं (नारीणां समूहो नारं; नाराणाम् अयनम् स्त्रीसमूहानाम् आश्रयं) अनुगतं (त्वदेकपरं) [बहुवल्लभमपि त्वदेकनिष्ठमिति भावः]; [माम्] क्षणम् अनुभज (सेवस्व) ॥१ ॥ अनुवाद—हे कामिनि ! किसलयोंसे बनी शय्या पर अपने चरण-नलिनको न्यस्त करो। तुम्हारे पद-पल्लवोंकी वैरिणी यह शय्या अब पराभवका अनुभव करे। हे राधिके ! मुहूर्त्त-मात्रके लिए आप मुझ नारायणका अनुसरण करें। पद्यानुवाद— मानिनि! अपना मान बिसारो। नव किसलय-शय्या पर सुन्दरि! पद-पद्मोंको धारो। और अरुणिमासे पल्लवके अहंभावको मारो॥ बालबोधिनी—श्रीहरि श्रीराधासे कहने लगे—हे कामिनि ! अपने चरण-कमल इस पल्लवकी सेज पर स्थापित करो। ये पल्लव तुम्हारे पद-पल्लवोंसे वैर रखते हैं। अपने पैरोंसे इन्हें प्रताड़ित करो, जिससे ये अपनी हारको अनुभूत कर लें। शत्रु अपने शत्रुको पराजित कर उसे अपने पैरोंसे रोंद ही तो डालता है। हे प्रिये ! अब तुम मेरा अनुसरण करो, तुम्हारे दर्शनोत्सवसे मैं अत्यधिक आनन्दित हो रहा हूँ। अब क्षण भर तुम्हारे साथ सम्भोगोत्सवसे मुझे आनन्दित होने दो। अब ऐसा पल आ गया है कि तुम अपने अनुगत नारायणके साथ विलसो। रस-सृष्टिकी भूमिका बनाते हुए श्रीकृष्ण कहने लगे—मैं नारायण हूँ। इस प्रसंगमें नारायणका अभिप्राय यह है कि जो नार अर्थात् जलमें निवास करता है, जो जनोंके आश्रय-स्वरूप हैं। जिस प्रकार कोई सन्तप्त व्यक्ति जलाशयमें जल-क्रीड़ा कर आनन्दकी अनुभूति करता है, उसी प्रकार तुम भी कामसंतप्ता हो, मेरे प्रेम-सागरमें

मानिनि! अपना मान बिसारो।

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३७९ जलक्रीड़ाके समान रतिकेलिका अनुभवकर आनन्द प्राप्त करो और मेरी भी शीतलताका विधान करो। प्रस्तुत श्लोकमें तल्प पर ‘पदपल्लवन्यास’ पदसे करणविशेष सूचित हुआ है। कर-कमलेन करोमि चरण-महमागमितासि विदूरम्। क्षणमुपकुरु शयनोपरि मामिव नूपुरमनुगतिशूरम्॥ क्षणमधुना....॥२॥ अन्वय—[तदारोहणेन कथं त्वदनुभजनं स्यादित्यत आह]— [अयि प्रिये] [अहम् आत्मनः] करकमलेन [तव] चरणमहं (चरणयोः महं पूजां) करोमि (संवाहयामीत्यर्थः) [यतः] [त्वं] विदूरम् (अतिदूरम्) आगमितासि (आनीतासि) [मयेति शेषः]; [दूरागतस्य पादसंवाहनमुचितमितिभावः]; [तदर्थं] क्षणं शयनोपरि (शय्यायां) अनुगतिशूरं (अनुगतौ अनुगमने सेवायां शूरं निपुणं) नूपुरमिव माम् उपकुरु (अङ्गीकुरु) [अनुगतस्य पाद-लग्नस्य उपकाराचरणं युक्तमेवेत्यर्थः]॥२॥ अनुवाद—हे प्रिये ! आप बहुत दूरसे चलकर आयी हैं। मैं अपने कर-कमलोंसे आपके चरणारविन्दोंका संवाहन करता हूँ। अपने नूपुरका अनुसरण करनेवाले मुझ शूर पर भी तुम इस शय्याके ऊपर क्षणभर उपकार करो। पद्यानुवाद— दूर देशसे थक आई हो, कर कमलोंसे अपने पद सहलाकर श्रम हर लूँगा (क्यों विहँसी चल नयने ?) दूँ उतार पायल, क्षण भर तो शैया पर ढिग मेरे। बैठो प्रिय! बतरससे हिय हो शीतल आज सबेरे॥ बालबोधिनी—श्रीकृष्ण कहते हैं—राधे! तुम बड़ी दूरसे चलकर आई हो, आओ, मैं अपने हाथोंसे तुम्हारे चरण-कमलोंको दबा दूँ, मैं इन चरणोंकी पूजा करता हूँ। इन नूपुरों पर उपकार कर जैसे तुम इनको धारण करती हो, उसी प्रकार

३८० श्रीगीतगोविन्दम् मुझ पर भी उपकार करो-इस शय्या पर। जिस प्रकार ये नूपुर सदा-सर्वदा तुम्हारा अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार मैं भी नित्य-निरन्तर तुम्हारा अनुसरण करता हूँ। अतः तुम्हारे द्वारा उपकृत किये जानेकी योग्यता मुझमें है। मैं भी तुम्हारे अनुग्रहका पात्र हूँ। वदन-सुधानिधि-गलितममृतमिव रचय वचनमनुकूलम्। विरहमिवापनयामि पयोधर-रोधकमुरसि दुकूलम् ॥ क्षणमधुना.... ॥३ ॥ अन्वय-[अनुज्ञां बिना पूजा न शुभावहा इति अनुज्ञां प्रार्थयते]-अयि प्रेयसि! वदन-सुधानिधि-गलितम् (वदनमेव सुधानिधिः चन्द्रः तस्मात् गलितम् निःसृतम्) अमृतम् इव अनुकूलं (अनुरागात्मकं) [अनुकूलमेव वचनम् अमृतवद्द्रवतीति भावः] वचनं रचय (वद); [ननु किमेतावता तवेप्सितं सेत्स्यतीत्याह] [अहं च] पयोधर-रोधकं (स्तनावरकं, स्तनाश्लेष- वाधकमित्यर्थः) दुकूलम् (वसनम्) उरसि (वक्षसि; अत्र पञ्चम्यर्थे सप्तमी) विरहमिव अपनयामि (अपसारयामि) [यथा विरहेण पयोधरदर्शनं विच्छिद्यते दुकूलेन; अतस्तत् दूरीकृत्य विरहव्यथामपि निवारयामि] ॥३ ॥ अनुवाद-हे राधे! अपने मुखसुधानिधिसे अमृततुल्य अनुकूल वचन कहिये। मिलनमें बाधक स्वरूप विरहके समान तुम्हारे पयोधर-स्थल पर स्थित वस्त्रको मैं हटाना चाहता हूँ। पद्यानुवाद- उर-दुकूल कर दूर कुचोंकी आलिंगन-आतुरता। अन्त करो भुज-पाश समाकर देवि! अखिल व्याकुलता ॥ विरह-अनलसे दग्ध देह यह नष्ट हुए सब सपने। अधर-सुधा-रससे जीवन दो इस अनुचरको अपने ॥

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३८१ बालबोधिनी—हे राधे ! अपने मुखसे रति उत्पन्न करनेवाले मनोहारी अनुकूल वचन कहिए। तुम्हारा मुख चन्द्रमाके समान है। जिस प्रकार चन्द्रमासे अमृत निःसृत होता है, उसी प्रकार तुम भी अपने मुखेन्दुसे सुधा-धारा वर्षण करो। सुरत-क्रीड़ा अनुकूल मीठी-मीठी बातें बोलो। मैं तुम्हारे विरहसे तापित हूँ, परस्पर उपमान-उपमेय भावसे कहते हैं कि दुकूलके समान विरहको हटाता हूँ, विरहके समान दुकूलको हटाता हूँ। जैसे विरह हम दोनोंके मिलनमें बाधक बनता है, उसी प्रकारसे यह तुम्हारे वक्षःस्थल पर विद्यमान दुकूल भी हम दोनोंके मिलनमें बाधक है। अतः इस बाधक या अवरोधकको हटानेकी मुझे अनुमति दो। यह दुकूल पयोधरोंका रोधक है। विरहमें कामिनियोंके पयोधरोंकी वृद्धि नहीं होती, उसी प्रकार वस्त्रसे आवृत पयोधरोंकी भी वृद्धि नहीं होती। अतः तुम्हारे स्तनोंके विकासको रोकनेवाले विरह रूप आवरणको मैं हटा देता हूँ। प्रिय-परिरम्भण-रभस-वलितमिव पुलकितमति दुरवापम्। मदुरसि कुचकलशं विनिवेशय शोषय मनसिज-तापम् ॥ क्षणमधुना.... ॥४॥ अन्वय—[ततो वक्त्रमवलोकयन्तीं प्रति व्याकुल सन्नाह]—[अयि प्रियतमे] मदुरसि (मम उरसि वक्षोदेशे) प्रिय-परिरम्भण-रभस-वलितमिव (प्रियस्य कान्तस्य मम परिरम्भणाय आलिङ्गनाय यो रभसः औत्सुक्यं तेन आलिङ्गनावेशेन इत्यर्थः वलितम् उच्छलितमिव) पुलकितं (रोमाञ्चितं) [कस्यचित् वृथार्त्तावलोकात् करुणः तदार्त्तिशमनाय पुलकितो भवति तद्वदयमपीत्यर्थः] अतिदुरवापं (अतिदुर्लभं) कुचकलसं (स्तनकुम्भं) विनिवेशय (स्थापय) [दुरापस्य हृद्येव धारण-योग्यत्वादिति भावः]; [तेनच मम] मनसिज-तापं (मदनसन्तापं) शोषय (खण्डय, निवारय इत्यर्थः) [रसायनार्पणात् तापोपशान्तिर्भवत्येवेत्यर्थः] ॥४॥

३८२ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—हे प्रिये ! प्रियतमके परिरम्भणके लिए सन्नद्ध तथा हर्ष-रोमांचसे पुलकित, दुष्प्राप्य इन कुच-कलशोंको मेरे वक्षःस्थल पर रखकर मेरे मनसिज तापको दूर कीजिए। बालबोधिनी—हे राधे! मेरे हृदय पर अपने कुच-कलशोंको धारण करा दो, जैसे मानो मंगलवेदी पर कुच-कलश रख रही हो। इस तरह मेरे मनसिज तापको शोषित कर डालो। कलश सन्निहित करने पर ताप तो चला ही जाता है। तुम्हारे कुचकलश पुलकित और रोमांचित हो रहे हैं। तुम्हारे अनुग्रहके बिना इनको प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। प्रियतमके आलिंगनके लिए ये अति सन्नद्ध एवं तत्पर हो रहे हैं। अतः इन्हें मेरे हृदय पर रखकर मेरे काम-सन्तापको दूर कर दीजिए। अधर-सुधारसमुपनय भामिनि ! जीवय मृतमिव दासम्। त्वयि विनिहित-मनसं विरहानलदग्धवपुषमविलासम् ॥ क्षणमधुना.... ॥५॥ अन्वय—[अन्यथा मे दशमी दशा स्यादित्यत आह]—अयि भामिनि (अभिमानवति) [वक्रदृष्ट्या अवलोकनात् भामिनीत्युक्तम्] अधर-सुधा-रसम् (अधरामृतम्) उपनय (देहि); त्वयि विनिहितमनसं (समर्पितचित्तम्; अनन्यगतिकमित्यर्थः) विरहानल- दग्धवपुषम् [अतएव] अविलासं (विलासरहितं निरानन्दमिति यावत्) मृतमिव (मृतप्रायं) दासं (किङ्करं) जीवय (गतजीवितमिव माम् अमृतं दत्त्वा सजीवं कुरु इति भावः) ॥५॥ अनुवाद—हे भामिनि ! तुममें ही निविष्ट मनवाले, विरहानलसे दग्ध, विलासरहित, मृतवत् मुझ दासको अपनी अधर-सुधा-रसका पान कराकर जीवित करो। बालबोधिनी—हे भामिनि ! तुम्हारे चरणोंकी ही परिचर्या करनेवाले इस दास पर तुम कृपा कर दो। अपने मानको त्याग दो, कोपको छोड़ दो। तुम्हारा चिन्तन करते-करते मैं

द्वादशः सर्गः- सुप्रीत-पीताम्बरः ३८३ विरहकी अग्निमें संतप्त हो रहा हूँ। तुम्हारा यह सेवक प्रायः मृतवत् हो गया है। अतः अपनी अधरसुधासे मुझ दासमें नये प्राणोंका संचार करो, मुझ निश्चेष्टको पुनः सक्रिय करो, सप्राण करो। मृत व्यक्ति अमृतका पान करके जीवित हो उठता है, मेरा मन तो तुममें ही लगा हुआ है, तुममें ही आसक्त है, विलास रहित विरहरूप अग्निसे दग्ध मुझे अधरामृतसे सिंचित करो। शशिमुखि! मुखरय मणिरशनागुणमनुगुणकण्ठनिनादम्। श्रुति-युगले पिकरुतविकले पुर शमय चिरादवसादम् ॥ क्षणमधुना.... ॥६ ॥ अन्वय- [मौनेन तत्सम्मतिमालक्ष्य लोभादन्यदपि प्रार्थयते]- अयि शशिमुखि (चन्द्रानने) अनुगुणकण्ठनिनादम् (अनुगुणः सदृशः कण्ठस्य निनादः ध्वनि यस्य तादृशं, तव कण्ठस्वरतुल्यं) मणिरसनागुणं (रत्नमय काञ्चीदामं) मुखरय (मुखरीकुरु; प्रार्थना-विशेषोऽयं) पिकरुत-विकले (पिकानां कोकिलानां रुतेन रवेण विकले व्याकुले; विरहस्योद्दीपकत्वादिति भावः) श्रुति- पुटयुगले (कर्णद्वये); चिरात् (चिरकालीनमित्यर्थः) अवसादं (अवसन्नतां) शमय (नाशय) ॥६ ॥ अनुवाद-हे विधुमुखी! अपनी करधनीकी मणियोंको मुखरित करो, उसीके समान अपना कण्ठ निनाद करो। इस प्रकारकी कोकिल-ध्वनिसे चिरकालसे अवसादित मेरे श्रुतियुगलको शमित करो। पद्यानुवाद- मधु किंकिणि-ध्वनिसे पूरित हों युगल कान ये मेरे। पिक-रवसे पीड़ित थे जो अति विरह-समयमें तेरे॥ बालबोधिनी-हे चन्द्रानने! तुम तो अमृत निस्पन्दन चन्द्रमा ही तो हो। अपनी मणिकी करधनीको अपने कण्ठ-स्वरके साथ इस प्रकार मुखरित करो कि विपरीत

३८४ श्रीगीतगोविन्दम् रति-कालमें वे तुम्हारे कण्ठ-स्वरके साथ ताल देने लगें। मेरे श्रोत्र-युगल जो कोयलकी कूक सुन-सुनकर खिन्न हो रहे थे, उस उद्दीपनसे अतृप्त हो रहे थे, उनमें संगीत समा जाने दो और चिरकालसे सञ्चित इस विरहके अवसादको शमित कर दो। पिक-रव विरहियोंके लिए दुःश्रव होता ही है। मामतिविफलरुषा विकलीकृतमवलोकितुमधुनेदम्। मीलतिलज्जितमिव नयनं तव विरमविसृजसि रतिखेदम्॥ क्षणमधुना.... ॥७॥ अन्वय—[मयि अकारण-कोपे तव नयनमेव प्रमाणमिति प्रार्थ्यते]—[अयि प्रेयसि] इदं तव नयनम् अधुना अति विफलरुषा (मानापरनाम्ना अकारण-कोपेन) विकलीकृतं (नितरां क्लेशितं) माम् अवलोकितुं (द्रष्टुं) लज्जितं (सलज्जमिव) मीलति (मुद्रितं भवति) [अन्योऽपि यः कश्चित् निरपराधं कुपित्वा व्याकुलीकरोति सोऽपि तन्मुखावलोकने लज्जितो भवतीत्यभिप्रायः]; तर्हि अधुना] विरम (रोषात् निवर्त्तस्व) [ततश्च] रतिखेदं (सुरत-वाम्यं) विसृज (त्यज) ॥७॥ अनुवाद—हे मानमयी! तुम अकारण ही मेरे प्रति अभिमान कर व्याकुल हो रही हो, देखो तुम्हारे लोचनद्वय मेरी ओर देखकर अर्द्धनिमीलित हो रहे हैं। अब तुम मेरे प्रति वाम्यभावका परित्याग करो। पद्यानुवाद— लाज भरे ये नेत्र देखने खुलते हैं—झप जाते। मान निगोड़ेके कारण हम, दो न एक हो पाते॥ बालबोधिनी—हे राधे! तुम्हारी ये आँखें सदैव व्यर्थके क्रोधसे मुझे ऐसे देखती थीं कि मैं व्यर्थ ही व्याकुल हो जाता था। मुझे विकल करनेके लिए तुम मेरे प्रति अकारण रोष दिखाया करती थीं। तुम्हारी इस उत्तेजनासे तो मैं

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३८५ टूक-टूक हो जाया करता था, देखो अब तुम्हारी दृष्टि मुझ पर प्रेम वर्षण कर रही है, क्रोधसे भरी दृष्टि अब स्वयं ही सलज्ज हो रही हैं, अब इन नेत्रोंके निरर्थक उन्मीलनका परित्याग कर दो। मुझ पर प्रसन्न हो जाओ और उत्साहसे भरकर रतिजन्य खेदका परित्याग कर दो। श्रीजयदेव-भणितमिदमनुपद-निगदितमधुरिपु-मोदम् । जनयतु रसिकजनेषु मनोरम रतिरस भाव-विनोदम् ॥ क्षणमधुना.... ॥८॥ अन्वय—अनुपद-निगदित-मधुरिपु-मोदं (अनुपदं प्रतिपदं निगदितः विवृतः मधुरिपोः श्रीकृष्णस्य मोदः हर्षः यत्र तादृशं) इदं श्रीजयदेव भणितं (श्रीजयदेव कथित गीतं) रसिकजनेषु (श्रीकृष्णभक्तजनविशेषेषु) मनोरम-रतिरसभावविनोदं (मनोरमे रतिरसे यो भावः तदास्वादरूपः तेन यो विनोदः हर्षः तं) जनयतु ॥८॥ अनुवाद—पद-पद पर मधुरिपु श्रीकृष्णके आनन्द विनोदका वर्णन करनेवाले जयदेव कवि द्वारा रचित यह गीत रसिक जनोंमें मनोरम-रति-रस-भाव विनोदको उत्पन्न करे। पद्यानुवाद— माधव कर मनुहार प्रियासे रति-विलास-रस भूले। जन-रञ्जक मधुमय लीला गा कवि 'जय' मनमें फूले ॥ बालबोधिनी—प्रस्तुत अष्टपदी 'मधुरिपुमोदविद्याधर-लीला' में कवि जयदेवने श्रीमूसूदनके प्रमोद-आनन्द-वर्द्धनका निरूपण किया है। यह गीत रसिकोंमें मनोहर रति-रस-आनन्दकी सृष्टि करे। रसिकजनोंमें रति-रस अथवा केलि-रसकी अनुपमता एवं उज्ज्वलताकी सर्वश्रेष्ठता अंगीकारकी जाती है। इसी राग-रसको ही महामहिम शृङ्गार-रसके नामसे ख्यापित किया गया है। इस प्रकार यह प्रबन्ध श्रीपति-श्रीकृष्णका प्रीतिकारक है, रति-रसके भावको विकसित करनेवाला है, संभोग-शृङ्गारको उन्मीलित करनेवाला है।

“अनुहारमयी राधा।”

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३८७ प्रत्यूहः पुलकांकुरेण निविडाश्लेषे निमेषेण च क्रीडाकूत-विलोकितेऽधर-सुधापाने कथा-नर्मभिः। आनन्दाधिगमेन मन्मथ-कला-युद्धेऽपि यस्मिन्नभू- दुद्भूतः स तयोर्बभूव सुरतारम्भः प्रियं भावुकः ॥१॥ अन्वय—[एवमुपकरण-सामग्रीं निरूप्य उपक्रम-सूचित- रहःकेलि-पर्यवसानमाह]—यस्मिन् (सुरतारम्भे) निविडाश्लेषे (प्रगाढालिङ्गने) पुलकाङ्कुरेण (रोमोद्गमेन); [तथा] क्रीडाकूत- विलोकिते (क्रीड़ायाम् आकूतविलोकिते सतृष्णावलोकने) निमेषेण; [तथा] अधरसुधापाने कथाकेलिभिः (वाक्चातुर्यैः); [तथाच] मन्मथकलायुद्धे (कामक्रीड़ाविशेषरूप संग्रामे) आनन्दाधिगमेन (चरमसुखप्राप्त्या) प्रत्यूहः (विघ्नः) अपि तयोः (राधाकृष्णयोः) प्रियम्भावुकः (प्रीतिजनकः) अभूत्, सः (तादृशः) सुरतारम्भः उद्भूतः (उत्पन्नः) वभूव। [अन्यत्र आरम्भे मध्ये वा प्रत्यूहो दोषजनक एव; इहतु आदौ मध्येऽपि प्रत्यूहः उत्तरोत्तरक्रीड़ारम्भक एव इति आरम्भस्य अद्भुतत्वं सूचितम्। एतेन केलीनाञ्च परमप्रेमविलासत्वमपि दर्शितम्] ॥१॥ अनुवाद—तदन्तर उन दोनोंका चिराकांक्षित अद्भुत, परमप्रिय सुरत-संग्राम आरम्भ हुआ। उस समय प्रगाढ़ आलिङ्गनमें पुलकायमान होना यथार्थ प्रतीत हुआ, क्रीड़ाके अभिप्रायसे देखनेके समय निमेषपात भी विघ्नीभूत लगता था, अधर-सुधा पान करते हुए केलि-कथाएँ भी कष्टदायिका अनुभूत हुईं, काम-कला-युद्धमें आनन्दका अधिगम भी विघ्न-सा ही प्रतीत हुआ। पद्यानुवाद— अति क्रीड़ा-बाधित आलिङ्गन। मन्द वार्ता-वारित चुम्बन॥ नयन नमित, वञ्चित मुख दर्शन। सुख अति, विस्मृत रति-लीला गुन॥

उमग रही राधा तन-मनमें। विलस रही मृदु सुमन-शयनमें॥ बालबोधिनी-प्रस्तुत श्लोकमें कवि जयदेव वर्णन करते हैं कि अब श्रीराधा और श्रीमाधवमें चिरकालसे आकांक्षित उनका अतिशय प्रिय सुरत प्रारम्भ हुआ। उस रतिक्रीड़ाके आरम्भमें पुलकावलीके प्रस्फुरणसे ही बाधा उत्पन्न होती है। आलिङ्गनके आरम्भमें सात्त्विक रोमाञ्चका होना युक्तिसंगत ही है। रोमाञ्चसे पूर्णालिङ्गनमें बाधा होना स्वाभाविक ही है। काम-क्रीड़ाके लिए विलोकन-अवलोकन करने पर पलकोंका गिरना भी बाधा प्रतीत हुई। अभिप्राय विशेषसे देखनेके कारण पलकोंका गिरना भी असहनीय होने लगा। अधर-सुधा पान करते समय काम-कथाएँ कहना भी अन्तराय प्रतीत हुआ। अधरपानमें प्रियालाप भी सहनीय नहीं होता है। रति-प्रियालापसे अतिशय रुचिर अधरपान लगता है। काम-कलाओंसे पूर्ण युद्धमें आनन्दकी प्राप्ति भी बाधा ही प्रतीत हुई। प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है, यथासंख्य अलंकार है, संभोग नामका शृङ्गार रस है, प्रस्तुत श्लोककी भूमिका चन्द्रहास नामक चौबीसवें प्रबन्धकी है।

दोर्भ्यां संयमितः पयोधर-भरेणापीड़ितः पाणिजै राविद्धो दशनैः क्षताधरपुटः श्रोणीतटेनाहतः। हस्तेनानमितः कचेऽधरसुधापानेन सम्मोहितः कान्तः कामपि तृप्तिमाप तदहो कामस्य वामा गतिः ॥२॥ अन्वय-न केवलं प्रत्यूह एव बन्धनादिकमपि क्रीड़ारम्भको वभूवेत्याह]–कान्तः (श्रीकृष्णः) दोर्भ्यां (भूजाभ्यां) संयमितः (नियन्त्रितः) पयोधरभरेण (पयोधरयोः स्तनयोः भरेण) आपीड़ितः (नितरां पीड़ितः) पाणिजैः (नखैः) आविद्धः) विक्षतः) दशनैः (दन्तैः) क्षताधरपुटः (क्षतम् अधरपुटं यस्य तादृशः)

द्वादशः सर्गः- सुप्रीत-पीताम्बरः ३८९ श्रोणीतटेन (नितम्बदेशेन) आहतः (नितरां ताड़ितः) हस्तेन कचे (केशे) आनमितः (वक्रीकृतः) अधर-मधुस्यन्देन (अधरसुधा- क्षरणेन अधरामृतदानेनेत्यर्थः) सम्मोहितः (सम्यक् मोहं प्राप्तः) [सन्] कामपि (अनिर्वाच्यां) तृप्तिं आप (प्राप्तवान्); अहो (आश्चर्यम्) तत् (तस्मात्) कामस्य गतिः (स्वरूपं) वामा (विचित्रा)। [कान्तया संयमनादिभिः परिभूतोऽपि कान्तः कामपि अनिर्वचनीयां तृप्तिं प्राप्तस्तदतीवाद्भुतमेवेति भावः] ॥२॥ अनुवाद-राधिकाकी बाहोंसे बँधे, पयोधर-भारसे दबे, पाणिज अर्थात् नखोंसे बिद्ध किये गये, दन्तोंसे क्षत किये गये अधरवाले, कटि-तट (नितम्ब) से आहत, हाथोंसे केश पकड़कर नमित किये गये, अधर-मधु-धारासे सम्मोहित प्रिय कान्त श्रीकृष्ण किसी लोकोत्तर आनन्दको प्राप्त हुए। इस प्रकार कामदेवकी गतिको अति कुटिल कहा गया है। पद्यानुवाद- बाहु-बद्ध, कुचसे आपीड़ित। दशन-अधर क्षत, श्रोणी ताड़ित॥ कर पंकज कल कुच ध्रुव धारित। रति-गति वामा (जग अपवारित)॥ उमग रही राधा तन-मनमें। विलस रही मृदु सुमन-शयनमें॥ बालबोधिनी-प्रस्तुत पद्यमें कवि जयदेव विपरीत रतिका वर्णन करते हुए कह रहे हैं कि कान्त श्रीकृष्णने किसी वाणीसे अगोचर तृप्तिको प्राप्त किया, इसीसे कहा जाता है कि कामकी गति वाम है, लोक-पथसे अतीत है। वामत्व रसान्तरके आविर्भावसे हुआ है। मानो अपराधीको वीर रसका आश्रय लेकर क्रमसे संयमन, पीड़न, बेधन, क्षताहत, नमन और सम्मोहनकी अवस्था तक पहुँचाया है। उत्साहके स्थिर होनेपर भी काम-युद्धसे विरत नहीं होते। श्रीराधाने विपरीत रतिके माध्यमसे श्रीकृष्णको अनेक प्रकारसे

३९० श्रीगीतगोविन्दम् दण्डित-पीड़ित किया। अपनी भुजाओंके बन्धनमें उनको बाँध लिया। पयोधरोंके भारसे उनको समस्त रूपसे दबाकर पीड़ित किया, नखोंसे उनको क्षत-विक्षत किया, दाँतोंसे उनके अधर-पुटको दंशित कर लिया, नितम्बोंसे उनको आस्फालित किया, प्रताड़ित किया, हाथोंसे बालोंको पकड़ लिया, अधरोंकी मधुधाराको पान करती हुई सम्मोहनको प्राप्त करा दिया। कितना आश्चर्य है! प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल-विक्रीड़ित छंद तथा रसवदलङ्कार है। कुछ विद्वान इसे 'कामिनीहास' नामक प्रबन्धकी भी संज्ञा देते हैं। माराङ्के रति-केलि-सङ्कुल-रणारम्भे तया साहस- प्रायं कान्तजयाय किञ्चिदुपरि प्रारम्भि यत्सम्भ्रमात्। निष्पन्दा जघनस्थली शिथिलता दोर्वल्लिरुत्कम्पितं वक्षो मीलितमक्षि पौरुषरसः स्त्रीणां कुतः सिध्यति ॥३॥ अन्वय—[तत्क्रीड़ाविशेषमाह]—माराङ्के (केलिपक्षे—मारः मदनः अङ्कः चिह्नं यत्र; रणपक्षे—मारः मारं अङ्कः चिह्नं यत्र तस्मिन्) रतिकेलिसङ्कुलरणारम्भे (रतिकेलिरेव सस्कुलरणः परस्पराहत-संग्रामः तस्य आरम्भे) तया (श्रीराधया) कान्तजयाय (कान्तस्य पराभवाय) उपरि (कान्तस्येति शेषः) साहसप्रायं (साहसबहुलं) यत्किञ्चित् (अनिर्वचनीयं) प्रारम्भि (उपक्रान्तं) तेन (वैपरीत्येन हेतुना) सम्भ्रमात् (सम्भ्रम-जनितात् आयासात् इत्यर्थः) [श्रीराधायाः] जघनस्थली निस्पन्दा [जाता], दोर्वल्लिः (भुजलता) शिथिलता (श्लथा आलस्यजड़ा इति यावत्) वक्षः उत्कम्पितं (उच्चैः कम्पितं), [तथाच] अक्षि (नेत्रयुगलं) मीलितम् (सङ्कुचितम्) [अभूत्]; [युक्तञ्चैतत्] स्त्रीणां (अवलानां) पौरुषरसः (पुरुष-सम्पाद्यव्यापारः) कुतः सिध्यति ॥३॥ अनुवाद—सुरत-क्रीड़ारूपी संग्रामके प्रारम्भ होनेपर श्रीराधाने काम-स्मर अभिनिवेशके कारण साहससे भरकर अपने कान्त पर विजय प्राप्त करनेके लिए कुछ समय तक श्रीकृष्णके

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३९१

वक्षस्थल पर सम्भ्रमपूर्वक जो विपरीत रति आरम्भ की, उससे उनकी जघनस्थली निष्पन्द हो गयी, बाहें शिथिल हो गयीं, वक्षःस्थल जोर-जोरसे काँपने लगा, आँखें बंद हो गयीं—भला स्त्रियोंका पौरुष-रस-अभिलाष कैसे सफल हो सकता है! बालबोधिनी—जैसा कि पूर्वोक्त वर्णन करते हुए आ रहे हैं, उसी वीरसंवलित शृङ्गारकी विवृत्ति करते हुए कहते हैं। इस श्लोकके पूर्व श्लोकसे ही युक्त करना चाहिए। रति-केलिसे संकुल रणके आरम्भमें वाम अंगमें वर्तमान श्रीराधाके द्वारा सम्भ्रमपूर्वक स्मर-समर अभिनिवेशसे संयम आदिके द्वारा कान्त पर विजय प्राप्त करनेके लिए जो कुछ भी साहस किया, इससे वे पूर्ण रूपसे थक गयीं। जघन-स्थलीके निष्पन्द होनेसे वह चलनेमें असमर्थ हो गयीं। दोनों भुजाओंकी शिथिलताके कारण वे बन्धन-प्रहार करनेमें असमर्थ हो गयीं। वक्षस्थल जोर-जोरसे कम्पित होने लगा। आँखें बन्द हो गयीं और देखनेमें असमर्थ हो गयीं। किसीने ठीक ही कहा—स्त्रियाँ अबला होती हैं, उनमें वीर रस किस प्रकारसे आ सकता है? पौरुषत्वको अबलाएँ प्राप्त नहीं कर सकतीं। प्रस्तुत श्लोकको कुछ विद्वानोंके द्वारा 'पौरुषप्रेम विलास' नामक प्रबन्ध माना गया है। इसमें शार्दूलविक्रीड़ित छंद, संभोग-शृङ्गार रस तथा विशेषोक्ति अलंकार है। तस्याः पाटल-पाणिजाङ्कितमुरो निद्राकषाये दृशौ निर्धौतोधर-शोणिमा विलुलिताःस्रस्तस्रजो मूर्धजाः। काञ्चीदाम दरश्लथाञ्चलमिति प्रातर्निखातै दृशो- रेभिः कामशरैस्तदद्भुतमभूत्पत्युर्मनः कीलितम् ॥ ४ ॥ अन्वय—[अथ सुरतान्ते चिह्नशोभित-वपु-दर्शनेन प्रियस्य प्रेमोत्सवमाह]—तस्याः (राधायाः) उरः (वक्षःस्थलं) पाटल- पाणिजाङ्कितं (पाटलैः पाटलकुसुमवत् श्वेतरक्तैः पाणिजैः

३१२ श्रीगीतगोविन्दम् नखैः अङ्कितं), दृशौ (नयने) निद्राकषाये (निद्रावेशेन कषाये लोहिते) अधर-शोणिमा, (अधरस्य शोणिमा लौहित्यं) निर्धौतः (बहुशः चुम्बनादिना क्षालितः); मूर्द्धजाः (केशाः) विलुलिताः (आलुलायिताः); [तथा] स्रस्तस्रजः (स्रस्ताः बन्धनशैथिल्यात् इतस्ततोगताः स्रजः मालाः येभ्यः तादृशाः); काञ्चीदाम (मेखला) दरश्लथाञ्चलम् (ईषत्श्लथप्रान्तभागम्); इति (इत्थं) प्रातः (प्रभाते) दृशोः (नेत्रयोः) निखातैः (प्रोथितैः) एभिः कामशरैः (नखाङ्क-जागरण-चुम्बनादिरूपैः मदन-बाणैः) पत्युः (कान्तस्य) मनः कीलितं (बिद्धम्), अहो तत् अद्भुतम् (आश्चर्यम्) अभूत्। [अन्यत्रार्पितशरैरन्यद् विद्धमित्याश्चर्यम्] ॥४॥ अनुवाद—श्रीराधाका उर-स्थल नखोंसे अंकित होनेके कारण पाटल वर्णका हो रहा था, निद्राके अभावसे उसकी दृष्टि लाल-लाल हो रही थी, अधरोंकी लालिमा चुम्बनसे नष्ट हो गयी थी, केशोंमें ग्रथित पुष्पमाला कुम्हला गयी थी, कमरकी करधनी शिथिल हो गयी थी, उसके समीपके वस्त्र खुल गये थे—इस प्रकार पाँच बाण जो प्रातःकाल श्रीकृष्णके नेत्रोंमें थे, उनको श्रीराधामें देखकर श्रीकृष्णका मन पुनः कामदेवके बाणोंसे कीलित हो गया। कैसी आश्चर्यकी बात है! बालबोधिनी—संभोग-लीलाका वर्णन करते हुए कवि जयदेव कहते हैं कि सम्भोगके अन्तमें श्रीराधाके पाँचों काम-शरोंके द्वारा श्रीकृष्ण कीलित हो गये। कितनी अद्भुत बात है! प्रातःकाल इन बाणोंके प्रभावसे श्रीकृष्णमें पुनः काम उद्भूत हो गया। प्रियाजुके किन अंगोंमें पञ्च बाणोंको देखकर श्रीकृष्णमें काम उत्पन्न हुआ? इसका निदर्शन करते हुए कवि कहते हैं— (१) पलाश पुष्प बाण—कामक्रीड़ामें श्रीराधाके वक्षःस्थल पर रक्त-कमलके समान अपने नखोंसे नखक्षत किया था। अतः पलाश पुष्प-बाण है।

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३९३ (२) कमल पुष्प-बाण—रात्रिमें सो न पानेके कारण आँखोंमें कषाय हो रहा था, आँखें लाल-लाल हो रही थीं, अतः कमल पुष्प-बाण है। (३) बन्धुजीव पुष्पबाण—श्रीराधाके अधरोंकी लालिमा प्रक्षालित हो गयी थी, अतः बन्धुजीव पुष्पबाण है। (४) मालती पुष्प-बाण—रति-क्रीड़ामें केशोंके मर्दनसे पुष्पमाला मुरझाकर निपतित हो गयी थी, अतः मालती पुष्पबाण है। (५) कुसुमास्त्रबाण—श्रीराधाकी मेखला और अञ्चल शिथिल हो गये थे, इससे कामदेवके सुवर्ण जातीय चम्पा आदि बाणोंको सूचित किया है। इन श्रीराधाके अङ्गोंमें विद्यमान पुष्पबाणोंको देखकर श्रीकृष्णका मन भी कीलित हो जाना स्वाभाविक ही था। इन बाणोंने श्रीकृष्णके नेत्रोंके माध्यमसे उनके मनको भी आहत कर दिया। प्रस्तुत श्लोकको ‘कामाद्भुताभिनवमृगाङ्क लेख’ नामक प्रबन्ध माना गया है। वही शार्दूलविक्रीड़ित छंद है और अद्भुतरसोपबृंहित शृङ्गार रस है। व्यालोलः केशपाशस्तरलितमलकैः स्वेदलोलौ कपोलौ क्लिष्टा दष्टाधरश्रीः कुचकलशरुचा हारिता हारयष्टिः। काञ्चीकाञ्चिद्गताशां स्तनजघनपदं पाणिनाच्छाद्यसद्यः पश्यन्ती सत्रपा मां तदपि विलुलित स्रग्धरेयं धिनोति ॥५ ॥ अन्वय—[यद्यपि श्रीराधायाः] केशपाशः व्यालोलः (श्लथः विकीर्ण इत्यर्थः) अलकैः (चूर्णकुन्तलैः) तरलितं (स्वस्थानात् भ्रंशितं); कपालौ (गण्डौ) स्वेदलोलौ (स्वेदेन घर्मजलेन लोलौ व्याप्तौ); दष्टाधरश्रीः (दशन-क्षताधर-शोभा), क्लिष्टा (क्षता); कुचकलस-रुचा (स्तनकुम्भयोः रुचा कान्त्या) [स्पर्द्धयेव] हारयष्टिः (मुक्ताहारः) हारिता (परिभूता); काञ्ची (मेखला)

३९४ श्रीगीतगोविन्दम् काञ्चीत् आशां (दिशं) गता; तदपि (तथापि) इयं (श्रीराधा) सद्यः (सपदि) पाणिना (करेण) स्तन-जघन-पदम् आच्छाद्य विलुलित-स्रग्धरा (विमर्दित माल्यधारिणी अपि) सत्रपं (रसावेश- शैथिल्ये निजाङ्गावलोकनात् आत्मनः क्रीड़ाविशेषावेशकलनात् सलज्जं यथा तथा) मां पश्यन्ति [सती] धिनोति (अत्युत्सुकं करोति) [वसनादिव्यतिरेकेण केवलाङ्गशोभादर्शनात् प्रीणनमिति ज्ञेयम्] ॥५॥ अनुवाद—जिनका केशपाश बिखर गया था, अलकावली चंचल हो गयी थी, कपोलयुगल स्वेदसे आर्द्र हो गये थे, अधरश्रीकी शोभा निरस्त हो गयी थी, कुच-कलशकी शोभासे मुक्ता-हारावली पराजित हो गयी थी, करधनीकी कान्ति हताश हो गयी थी; प्रातः ऐसी अवस्था पर क्लान्तश्रान्त श्रीराधा अपने हाथोंसे सद्यः वक्षोज एवं उरुद्वयको ढकने लगी, लज्जापूर्वक श्रीकृष्णको देखती हुई वह अपनी मुग्धकारिणी कान्तिसे श्रीकृष्णको आनन्दकारिणी जान पड़ रही थीं। बालबोधिनी—श्रीराधा रतिकालमें परिमर्दित होकर श्रान्त- क्लान्त हो गयी थीं। जैसे ही प्रातःकाल हुआ, वह लज्जापूर्वक जल्दी-जल्दी अपने अङ्गोंको आच्छादित करने लगीं। आच्छादित करती हुई वह श्रीकृष्णको देख रही थीं और अपनी मुग्ध-कान्तिसे श्रीकृष्णका मन मोह रही थीं। उनका कबरी-बन्धन खुल गया था, अलकावली इधर-उधर बिखर रही थी। कपोलयुगल पर स्वेद सूख जाने पर अनेक धब्बे पड़ गये थे, बिम्ब-अधरोंकी कान्ति धूमिल हो गयी थी, स्तन-कलशोंकी कान्तिके पुरःसरमें हार एवं काञ्चीकी कान्ति हताश हो गयी थी। कञ्चुकके अभावसे हारकी शोभा फीकी पड़ गयी थी और विवस्त्र होनेसे मेखलाकी कान्ति भी धूमिल हो गयी। प्रस्तुत पदमें स्रग्धरा छन्द है।

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३९५ ईषन्मीलितदृष्टि मुग्धविलसत्सीत्कारधारावशा- दव्यक्ताकुलकेलिकानुविकसदन्तांशुधौताधरम् । शान्तस्तब्धपयोधरं भृशपरिष्वङ्गात्कुरङ्गीदृशो हर्षोत्कर्षविमुक्तनिःसहतनोर्धन्यो धयत्याननम् ॥६॥ अन्वय—श्वासोन्नद्ध-पयोधरोपरि-परिष्वङ्गी (श्वासेन उन्नद्धयोः स्फीतयोः पयोधरयोः उपरि परिष्वङ्गः आलिङ्गनं विद्यते यस्य तादृशः) धन्यः (आत्मानं धन्यं मन्यमानः सौभाग्यशाली जनः) हर्षोत्कर्ष-विमुक्तिनिःसहतनोः (हर्षोत्कर्षस्य आनन्दातिशयस्य विमुक्त्या प्रसृत्या निःसहा धर्त्तुमशक्या तनुर्यस्याः तादृश्याः) कुरङ्गीदृशः (मृगलोचनायाः) [कान्तायाः] मीलद्दृष्टि (मीलन्ती सङ्कुचन्ती दृष्टिः यत्र तत् आवेशवशात् मुदितलोचनविशिष्ट- मित्यर्थः) मिलत्कपोलपुलकं (कपोल-पुलक-समन्वितं) शीत्कारधारावशात् (शीत्कारस्य या धारा अनवच्छिन्नता तस्या वशात्) अव्यक्ताकुल-केलि-काकु-विकसदन्तांशु-धौताधरं (अव्यक्ता अपरिस्फुटा आकुला असम्बन्धा या केलिषु काकुः तया विकसद्भिः दन्तांशुभिर्दन्त-प्रभाभिः धौतः अधरः यत्र तादृशं) आननं धयति (चुम्बति) ॥६॥ अनुवाद—मृगनयनी श्रीराधाकी आँखें कामकेलिजन्य आनन्दातिशयके कारण कुछ-कुछ बन्द-सी हो रही थीं, अन्य प्रकारके व्यापारको सह सकनेमें असमर्थ शरीरवाली हो गयी थीं, मुहुर्मुहुः सीत्कार करनेके कारण और अव्यक्त तथा आकुल केलि-काकु ध्वनि-विकारसे विकसित दाँतोंकी किरणोंसे उनके अधर प्रक्षालित हो गये थे, प्रगाढ़ आलिङ्गनके कारण उनके पयोधर शिथिल श्वासोच्छ्वासके कारण ईषत् कम्पित हो रहे थे—इस प्रकारके मुखमण्डलको कोई पुण्यशाली ही देख सकता है। बालबोधिनी—कवि कहते हैं कि रतिक्रीड़ामें अत्यधिक हर्षोत्कर्ष प्राप्त कर लेनेके कारण आलिंगन, चुम्बन आदिसे विमुक्त होकर श्रीराधा एक प्रकारसे परमानन्दमें डूब गयीं।

३९६ श्रीगीतगोविन्दम् कामावेशके वशीभूत उनके शरीरने अब किसी भी प्रकारके व्यापारको सह सकनेमें असमर्थता प्रकट कर दी। रतिकालमें उस मृगलोचनाके पयोधर प्रगाढ़ आलिङ्गनके कारण पुलकरहित कठिन और कुछ झुके हुए हो गये। इस प्रकार सुरतान्तमें कान्त श्रीकृष्ण उनके मुखको देखकर पुनरालिङ्गनके द्वारा अधर-पानकी स्पृहा करने लगे। नेत्र कुछ मुकुलित हो गये। विलास-क्रीड़ाके समय उनके द्वारा बार-बार मनोहर सीत्कार करनेके कारण निकलनेवाली अव्यक्त एवं आकुल काकु ध्वनि प्रस्फुटित हुई और दाँतोंकी किरणोंसे अधर-पुट धुल गये। श्रीराधाके इस प्रकारके मुखमण्डलको कोई सुकृतिवान् ही देख सकता है। यह सौभाग्य या तो श्रीकृष्णको अथवा उनकी मञ्जरियोंको ही प्राप्त हो सकता है। प्रस्तुत पदमें शार्दूलविक्रीड़ित छंद, जाति अलंकार, पाञ्चाली रीति, मागधी गीति, भारती वृत्ति और स्थित लययुक्त गान है। श्रीराधा श्रीकृष्णके बीच प्रगाढ़ आलिङ्गनको 'वृक्षाधिरूढ़कम्' आलिङ्गन कहा गया है। [अथ सा निर्गतबाधा राधा स्वाधीनभर्तृका। निजगाद रतिक्लान्तं कान्तं मण्डनवाञ्छया॥] अथ सहसा सुप्रीतं सुरतान्ते सा नितान्तखिन्नाङ्गी। राधा जगाद सादरमिदमानन्देन गोविन्दम् ॥७॥ अन्वय-[एवं प्रियदर्शनानन्दोन्मत्ता प्रियं जगादेति तस्याः स्वाधीनभर्त्तृकावस्थां वर्णयिष्यन् आह]-[स्वाधीनभर्त्तृकालक्षणं यथा-कान्तो रतिगुणाकृष्टो न जहाति यदन्तिकम्। विचित्र- विभ्रमासक्ता सा स्यात् स्वाधीनभर्त्तृका॥ इति साहित्यदर्पणे] सुरतान्ते (सुरतावसाने) नितान्तखिन्नाङ्गी (अतीवक्लान्तावयवा) सा राधा इति (उक्तप्रकारेण) मनसा निगदन्तं (कथयन्तं चिन्तयन्तमित्यर्थः) गोविन्दम् आनन्देन (आनन्दावेशेन) सादरं (यथा स्यात् तथा) इदं (वक्ष्यमाणं वचनं) जगाद (उक्तवती) ॥७॥