गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१२ श्रीगीतगोविन्दम् नखैः अङ्कितं), दृशौ (नयने) निद्राकषाये (निद्रावेशेन कषाये लोहिते) अधर-शोणिमा, (अधरस्य शोणिमा लौहित्यं) निर्धौतः (बहुशः चुम्बनादिना क्षालितः); मूर्द्धजाः (केशाः) विलुलिताः (आलुलायिताः); [तथा] स्रस्तस्रजः (स्रस्ताः बन्धनशैथिल्यात् इतस्ततोगताः स्रजः मालाः येभ्यः तादृशाः); काञ्चीदाम (मेखला) दरश्लथाञ्चलम् (ईषत्श्लथप्रान्तभागम्); इति (इत्थं) प्रातः (प्रभाते) दृशोः (नेत्रयोः) निखातैः (प्रोथितैः) एभिः कामशरैः (नखाङ्क-जागरण-चुम्बनादिरूपैः मदन-बाणैः) पत्युः (कान्तस्य) मनः कीलितं (बिद्धम्), अहो तत् अद्भुतम् (आश्चर्यम्) अभूत्। [अन्यत्रार्पितशरैरन्यद् विद्धमित्याश्चर्यम्] ॥४॥ अनुवाद—श्रीराधाका उर-स्थल नखोंसे अंकित होनेके कारण पाटल वर्णका हो रहा था, निद्राके अभावसे उसकी दृष्टि लाल-लाल हो रही थी, अधरोंकी लालिमा चुम्बनसे नष्ट हो गयी थी, केशोंमें ग्रथित पुष्पमाला कुम्हला गयी थी, कमरकी करधनी शिथिल हो गयी थी, उसके समीपके वस्त्र खुल गये थे—इस प्रकार पाँच बाण जो प्रातःकाल श्रीकृष्णके नेत्रोंमें थे, उनको श्रीराधामें देखकर श्रीकृष्णका मन पुनः कामदेवके बाणोंसे कीलित हो गया। कैसी आश्चर्यकी बात है! बालबोधिनी—संभोग-लीलाका वर्णन करते हुए कवि जयदेव कहते हैं कि सम्भोगके अन्तमें श्रीराधाके पाँचों काम-शरोंके द्वारा श्रीकृष्ण कीलित हो गये। कितनी अद्भुत बात है! प्रातःकाल इन बाणोंके प्रभावसे श्रीकृष्णमें पुनः काम उद्भूत हो गया। प्रियाजुके किन अंगोंमें पञ्च बाणोंको देखकर श्रीकृष्णमें काम उत्पन्न हुआ? इसका निदर्शन करते हुए कवि कहते हैं— (१) पलाश पुष्प बाण—कामक्रीड़ामें श्रीराधाके वक्षःस्थल पर रक्त-कमलके समान अपने नखोंसे नखक्षत किया था। अतः पलाश पुष्प-बाण है।