गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३९३ (२) कमल पुष्प-बाण—रात्रिमें सो न पानेके कारण आँखोंमें कषाय हो रहा था, आँखें लाल-लाल हो रही थीं, अतः कमल पुष्प-बाण है। (३) बन्धुजीव पुष्पबाण—श्रीराधाके अधरोंकी लालिमा प्रक्षालित हो गयी थी, अतः बन्धुजीव पुष्पबाण है। (४) मालती पुष्प-बाण—रति-क्रीड़ामें केशोंके मर्दनसे पुष्पमाला मुरझाकर निपतित हो गयी थी, अतः मालती पुष्पबाण है। (५) कुसुमास्त्रबाण—श्रीराधाकी मेखला और अञ्चल शिथिल हो गये थे, इससे कामदेवके सुवर्ण जातीय चम्पा आदि बाणोंको सूचित किया है। इन श्रीराधाके अङ्गोंमें विद्यमान पुष्पबाणोंको देखकर श्रीकृष्णका मन भी कीलित हो जाना स्वाभाविक ही था। इन बाणोंने श्रीकृष्णके नेत्रोंके माध्यमसे उनके मनको भी आहत कर दिया। प्रस्तुत श्लोकको ‘कामाद्भुताभिनवमृगाङ्क लेख’ नामक प्रबन्ध माना गया है। वही शार्दूलविक्रीड़ित छंद है और अद्भुतरसोपबृंहित शृङ्गार रस है। व्यालोलः केशपाशस्तरलितमलकैः स्वेदलोलौ कपोलौ क्लिष्टा दष्टाधरश्रीः कुचकलशरुचा हारिता हारयष्टिः। काञ्चीकाञ्चिद्गताशां स्तनजघनपदं पाणिनाच्छाद्यसद्यः पश्यन्ती सत्रपा मां तदपि विलुलित स्रग्धरेयं धिनोति ॥५ ॥ अन्वय—[यद्यपि श्रीराधायाः] केशपाशः व्यालोलः (श्लथः विकीर्ण इत्यर्थः) अलकैः (चूर्णकुन्तलैः) तरलितं (स्वस्थानात् भ्रंशितं); कपालौ (गण्डौ) स्वेदलोलौ (स्वेदेन घर्मजलेन लोलौ व्याप्तौ); दष्टाधरश्रीः (दशन-क्षताधर-शोभा), क्लिष्टा (क्षता); कुचकलस-रुचा (स्तनकुम्भयोः रुचा कान्त्या) [स्पर्द्धयेव] हारयष्टिः (मुक्ताहारः) हारिता (परिभूता); काञ्ची (मेखला)