गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९४ श्रीगीतगोविन्दम् काञ्चीत् आशां (दिशं) गता; तदपि (तथापि) इयं (श्रीराधा) सद्यः (सपदि) पाणिना (करेण) स्तन-जघन-पदम् आच्छाद्य विलुलित-स्रग्धरा (विमर्दित माल्यधारिणी अपि) सत्रपं (रसावेश- शैथिल्ये निजाङ्गावलोकनात् आत्मनः क्रीड़ाविशेषावेशकलनात् सलज्जं यथा तथा) मां पश्यन्ति [सती] धिनोति (अत्युत्सुकं करोति) [वसनादिव्यतिरेकेण केवलाङ्गशोभादर्शनात् प्रीणनमिति ज्ञेयम्] ॥५॥ अनुवाद—जिनका केशपाश बिखर गया था, अलकावली चंचल हो गयी थी, कपोलयुगल स्वेदसे आर्द्र हो गये थे, अधरश्रीकी शोभा निरस्त हो गयी थी, कुच-कलशकी शोभासे मुक्ता-हारावली पराजित हो गयी थी, करधनीकी कान्ति हताश हो गयी थी; प्रातः ऐसी अवस्था पर क्लान्तश्रान्त श्रीराधा अपने हाथोंसे सद्यः वक्षोज एवं उरुद्वयको ढकने लगी, लज्जापूर्वक श्रीकृष्णको देखती हुई वह अपनी मुग्धकारिणी कान्तिसे श्रीकृष्णको आनन्दकारिणी जान पड़ रही थीं। बालबोधिनी—श्रीराधा रतिकालमें परिमर्दित होकर श्रान्त- क्लान्त हो गयी थीं। जैसे ही प्रातःकाल हुआ, वह लज्जापूर्वक जल्दी-जल्दी अपने अङ्गोंको आच्छादित करने लगीं। आच्छादित करती हुई वह श्रीकृष्णको देख रही थीं और अपनी मुग्ध-कान्तिसे श्रीकृष्णका मन मोह रही थीं। उनका कबरी-बन्धन खुल गया था, अलकावली इधर-उधर बिखर रही थी। कपोलयुगल पर स्वेद सूख जाने पर अनेक धब्बे पड़ गये थे, बिम्ब-अधरोंकी कान्ति धूमिल हो गयी थी, स्तन-कलशोंकी कान्तिके पुरःसरमें हार एवं काञ्चीकी कान्ति हताश हो गयी थी। कञ्चुकके अभावसे हारकी शोभा फीकी पड़ गयी थी और विवस्त्र होनेसे मेखलाकी कान्ति भी धूमिल हो गयी। प्रस्तुत पदमें स्रग्धरा छन्द है।