भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३९५ ईषन्मीलितदृष्टि मुग्धविलसत्सीत्कारधारावशा- दव्यक्ताकुलकेलिकानुविकसदन्तांशुधौताधरम् । शान्तस्तब्धपयोधरं भृशपरिष्वङ्गात्कुरङ्गीदृशो हर्षोत्कर्षविमुक्तनिःसहतनोर्धन्यो धयत्याननम् ॥६॥ अन्वय—श्वासोन्नद्ध-पयोधरोपरि-परिष्वङ्गी (श्वासेन उन्नद्धयोः स्फीतयोः पयोधरयोः उपरि परिष्वङ्गः आलिङ्गनं विद्यते यस्य तादृशः) धन्यः (आत्मानं धन्यं मन्यमानः सौभाग्यशाली जनः) हर्षोत्कर्ष-विमुक्तिनिःसहतनोः (हर्षोत्कर्षस्य आनन्दातिशयस्य विमुक्त्या प्रसृत्या निःसहा धर्त्तुमशक्या तनुर्यस्याः तादृश्याः) कुरङ्गीदृशः (मृगलोचनायाः) [कान्तायाः] मीलद्दृष्टि (मीलन्ती सङ्कुचन्ती दृष्टिः यत्र तत् आवेशवशात् मुदितलोचनविशिष्ट- मित्यर्थः) मिलत्कपोलपुलकं (कपोल-पुलक-समन्वितं) शीत्कारधारावशात् (शीत्कारस्य या धारा अनवच्छिन्नता तस्या वशात्) अव्यक्ताकुल-केलि-काकु-विकसदन्तांशु-धौताधरं (अव्यक्ता अपरिस्फुटा आकुला असम्बन्धा या केलिषु काकुः तया विकसद्भिः दन्तांशुभिर्दन्त-प्रभाभिः धौतः अधरः यत्र तादृशं) आननं धयति (चुम्बति) ॥६॥ अनुवाद—मृगनयनी श्रीराधाकी आँखें कामकेलिजन्य आनन्दातिशयके कारण कुछ-कुछ बन्द-सी हो रही थीं, अन्य प्रकारके व्यापारको सह सकनेमें असमर्थ शरीरवाली हो गयी थीं, मुहुर्मुहुः सीत्कार करनेके कारण और अव्यक्त तथा आकुल केलि-काकु ध्वनि-विकारसे विकसित दाँतोंकी किरणोंसे उनके अधर प्रक्षालित हो गये थे, प्रगाढ़ आलिङ्गनके कारण उनके पयोधर शिथिल श्वासोच्छ्वासके कारण ईषत् कम्पित हो रहे थे—इस प्रकारके मुखमण्डलको कोई पुण्यशाली ही देख सकता है। बालबोधिनी—कवि कहते हैं कि रतिक्रीड़ामें अत्यधिक हर्षोत्कर्ष प्राप्त कर लेनेके कारण आलिंगन, चुम्बन आदिसे विमुक्त होकर श्रीराधा एक प्रकारसे परमानन्दमें डूब गयीं।