गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९६ श्रीगीतगोविन्दम् कामावेशके वशीभूत उनके शरीरने अब किसी भी प्रकारके व्यापारको सह सकनेमें असमर्थता प्रकट कर दी। रतिकालमें उस मृगलोचनाके पयोधर प्रगाढ़ आलिङ्गनके कारण पुलकरहित कठिन और कुछ झुके हुए हो गये। इस प्रकार सुरतान्तमें कान्त श्रीकृष्ण उनके मुखको देखकर पुनरालिङ्गनके द्वारा अधर-पानकी स्पृहा करने लगे। नेत्र कुछ मुकुलित हो गये। विलास-क्रीड़ाके समय उनके द्वारा बार-बार मनोहर सीत्कार करनेके कारण निकलनेवाली अव्यक्त एवं आकुल काकु ध्वनि प्रस्फुटित हुई और दाँतोंकी किरणोंसे अधर-पुट धुल गये। श्रीराधाके इस प्रकारके मुखमण्डलको कोई सुकृतिवान् ही देख सकता है। यह सौभाग्य या तो श्रीकृष्णको अथवा उनकी मञ्जरियोंको ही प्राप्त हो सकता है। प्रस्तुत पदमें शार्दूलविक्रीड़ित छंद, जाति अलंकार, पाञ्चाली रीति, मागधी गीति, भारती वृत्ति और स्थित लययुक्त गान है। श्रीराधा श्रीकृष्णके बीच प्रगाढ़ आलिङ्गनको 'वृक्षाधिरूढ़कम्' आलिङ्गन कहा गया है। [अथ सा निर्गतबाधा राधा स्वाधीनभर्तृका। निजगाद रतिक्लान्तं कान्तं मण्डनवाञ्छया॥] अथ सहसा सुप्रीतं सुरतान्ते सा नितान्तखिन्नाङ्गी। राधा जगाद सादरमिदमानन्देन गोविन्दम् ॥७॥ अन्वय-[एवं प्रियदर्शनानन्दोन्मत्ता प्रियं जगादेति तस्याः स्वाधीनभर्त्तृकावस्थां वर्णयिष्यन् आह]-[स्वाधीनभर्त्तृकालक्षणं यथा-कान्तो रतिगुणाकृष्टो न जहाति यदन्तिकम्। विचित्र- विभ्रमासक्ता सा स्यात् स्वाधीनभर्त्तृका॥ इति साहित्यदर्पणे] सुरतान्ते (सुरतावसाने) नितान्तखिन्नाङ्गी (अतीवक्लान्तावयवा) सा राधा इति (उक्तप्रकारेण) मनसा निगदन्तं (कथयन्तं चिन्तयन्तमित्यर्थः) गोविन्दम् आनन्देन (आनन्दावेशेन) सादरं (यथा स्यात् तथा) इदं (वक्ष्यमाणं वचनं) जगाद (उक्तवती) ॥७॥