भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३९७ अनुवाद—[इसके बाद जिसकी काम-बाधा शान्त हो गयी है, ऐसी स्वाधीनभर्तृका श्रीराधा अपने रति-श्रम-क्लान्त कान्तसे अपने शृङ्गारकी कामनासे बोलीं] तदनन्तर सुरतकालके अन्तमें अति खिन्न अंगोंवाली श्रीराधा अचानक आनन्द और आदरपूर्वक श्रीगोविन्दसे कहने लगीं। पद्यानुवाद— सरस सुरतिके अन्त, अङ्गसे छिन्न भिन्न हो बाला— हरिसे बोल उठी आँखोंमें भर कर मदकी हाला— हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! (लगा रहे क्यों देरी?) बालबोधिनी—अनन्तर दोनोंके परस्पर आनन्द एवं सन्दोहरूप सुरतके अवसान पर श्रीराधा गोविन्दको प्रोत्साहित करते हुए कहने लगीं। सम्भोगके अवसान पर श्रीराधाके अंग अतिशय रूपसे थक गये थे। श्रीराधाने अपने कान्त श्रीगोविन्दको आनन्दमय देखा और कहा। जब स्वामी प्रीतिपरायण हो तब ही अपनी बात कहना साफल्यपूर्ण होता है—यह नीति है। अतः श्रीराधा सस्मित गोविन्दसे जो कहने लगीं, उसका वर्णन इस काव्यके अगले प्रबन्धमें किया जा रहा है। गीतम् ॥२४॥ रामकरीरागयतित्तालभ्यां गीयते। कुरु यदुनन्दन! चन्दनशिशिरतरेण करेण पयोधरे। मृगमद-पत्रकमत्र मनोभवमङ्गलकलशसहोदरे ॥१॥ निजगाद सा यदुनन्दने क्रीड़ति हृदयानन्दने ॥ध्रुवपदम्॥ अन्वय—हृदयानन्दने (हृदयमानन्दयति स्वचापल्येन क्रीड़नाय उन्मुखं करोतीति हृदयानन्दनः तस्मिन् चित्ताह्लादके) यदुनन्दने