गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९८ श्रीगीतगोविन्दम् (श्रीकृष्णे) क्रीड़ति (विलसति सति) [सुरतान्तेऽपि चिक्रीड़िषोदयात् अखण्डलीलात्वमुक्तम्] सा [राधा] [तं प्रति] निजगाद [क्रीड़नसमयेऽपि प्रियप्रेरणात् नित्यस्वाधीनभर्तृकत्वे प्राधान्यं द्योतितम्]।—अयि यदुनन्दन (महाकुलोद्भवत्वेन सर्वातिशायि- नामक-गुण-ख्यापनाय सम्बोधनमिदं) [यदि पुनर्मनोभव-मखारम्भः सम्भवति तदा] [चन्दनादपि] शिशिरतरेण; [शीतलत्वेन अव्यग्रतया करणयोग्यता सूचिता) [तव] करेण अत्र मनोभव-मङ्गल-कलस- सहोदरे (मनोभवस्य कामस्य यः मङ्गलकलसः तस्य सहोदरे तत्सदृशे; मङ्गलकलसोऽपि यथाविधानेन स्थाप्यते, अतस्त्वमपि तथा कुरु इत्यर्थः) [मम] पयोधरे (स्तने) मृगमद-पत्रकं (कस्तूरिका-पत्रावलीं) कुरु (रचय) ॥१॥ अनुवाद—हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले यदुनन्दनके साथ क्रीड़ा करती हुई श्रीराधाने कहा—हे यदुनन्दन! चन्दनसे भी अति शीतल अपने हाथोंसे मनोभवके मङ्गल-कलशके समान मेरे पयोधरों पर मृगमदसे पत्रक-रचना कीजिए। पद्यानुवाद— चन्दन-शिशिर समान करोंसे कुच कलशों पर मेरे, मृगमद पत्रक सुन्दर। सहचर चित्रित करो सबेरे। हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी—प्रस्तुत पदमें हृदयानन्दन ध्रुव पद है। श्रीकृष्ण श्रीराधाके हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले थे। यदुनन्दन—यदुवंशमें उत्पन्न होनेवाले नन्दनन्दन श्रीकृष्णको अपने साथ क्रीड़ा करते देखकर श्रीराधा बोलीं—मुझे अपने हाथोंसे वैसा ही सजा दो, जैसे मैं भी पूरी-की-पूरी कृष्णभावित, कृष्णमयी हूँ। सर्वप्रथम मेरे स्तन-कलशों पर चन्दनके समान शीतल स्पर्शसे कस्तूरीसे पत्रावलीकी रचना करो। मङ्गल-कलश पयपूर्ण होते हैं, सुनील आम्र-पल्लवोंसे सुसज्जित होते हैं, जिन्हें कामदेवकी विश्वयात्राके समय