गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशः सर्गः - सुप्रीत-पीताम्बरः ३९९ स्थापित कर दिया जाता है। इस पदसे 'मयूरपदक' नामका नख-क्षत भी व्यञ्जित हो रहा है। यहाँ कस्तूरी-पत्रक चित्रकारीका अनुनय किया जा रहा है। अलिकुल-गञ्जन-सञ्जनकं रतिनायक-शायक-मोचने। त्वदधर-चुम्बन-लम्बित-कज्जलमुज्ज्वलय प्रियलोचने॥ निज.... ॥२॥ अन्वय-अयि प्रिय (प्रीतिभाजन), रति-नायक-शायक-मोचने (रतिनायकस्य मदनस्य सायकान् बाणान् कटाक्षादिरूपान् मोचयतीति तथोक्ते; कज्जलादिकमपि तत्रापेक्षितमस्तीति भावः) [मम] लोचने (नेत्रे) अलिकुल-गञ्जन-सञ्जनकं (अलिकुल- गञ्जनं सञ्जनयति इति तादृशं भ्रमर-निकर-तिरस्कारकमित्यर्थः) त्वदधर-चुम्बन-लम्बित-कज्जलम् (तवाधरचुम्बनेन, लम्बितं गलितं कज्जलं) उज्जलय (उज्जलं कुरु; पूर्ववत् विधेहीत्यर्थः) ॥२॥ अनुवाद-हे प्रिये! रतिनायक कामदेवके सायकोंको छोड़नेवाली मेरी आँखोंका काजल तुम्हारे अधरोंके चुम्बनसे गलित हो गया है, अलि-कुलको भी तिरस्कृत करनेवाले कज्जलको मेरी आँखोंमें उज्ज्वल कीजिए। पद्यानुवाद- रति नायक सायक मोचन ये, लोचन आँजो फिर से, चुम्बन गलित हुआ काजल है, जिस पर भौंरे तरसे। हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी-हे प्रिय! हे हृदयानन्दन! श्रीराधा इस प्रकार आगे कहती हैं कि मेरी आँखोंमें नूतन कज्जल रेखाको आँजो। यह इतनी उज्ज्वल हो कि भ्रमर-समूह भी तिरस्कृत हो जायँ। मेरे ही कटाक्षपातसे कामदेवके बाण