गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०० श्रीगीतगोविन्दम् चलते हैं। तुम्हारे द्वारा अधर-चुम्बन करनेसे मेरी आँखोंका काजल फैल गया है। इस पदसे श्रीकृष्णके द्वारा श्रीराधाके नेत्रोंका चुम्बन भी अभिव्यक्त हो रहा है। आप ही तो मेरी आँखोंका अञ्जन हैं। हे मनोहरवेषधारिन्! नयन-कुरङ्ग-तरङ्ग-विकास-निरासकरे श्रुतिमण्डले। मनसिज-पाश विलासधरे शुभवेश निवेशय कुण्डले ॥ निज.... ॥३॥ अन्वय—अयि शुभवेश (सुन्दर-वेशधारिन्), नयन-कुरङ्ग- तरङ्ग-विकास-निरासकरे (नयनमेव कुरङ्गः, तस्य तरङ्गः कुर्दनं तस्य या विकाशः स्फुरणं तस्य निरासं प्रत्याख्यानं करोतीति तस्मिन्) मनसिज-पाश-विलासधरे (मनसिजस्य कामस्य यः पाशः मृग-बन्धनरज्जुः तस्य विलासं शोभां धरतीति तथोक्ते) कुण्डले (सुरतभ्रष्टे इतिभावः) श्रुतिमण्डले (कर्णे) निवेशय (परिधापय)। [शुभकर्माणि कृतवेशस्य तव प्रियत्वात् ममापि तथा वेशकरणं युक्तमित्यभिप्रायः] ॥३॥ अनुवाद—हे शुभवेश ! नयनरूपी कुरङ्ग-तरङ्गके विकासको निरस्त करनेवाले तथा युवकोंके मनको बाँधनेवाले कामदेवके पाशके समान मेरे श्रुतिमण्डल पर कुण्डल धारण कराइये। पद्यानुवाद— मनसिज पाश विलास कुण्डलोंको कानोंमें धारो, हे शुभ अंग! तरंग नयन पर हरिण वृन्दको कारो। हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णसे कहती हैं—हे मनोहर- वेषधारिन्! हे प्रिय पीताम्बरधारिन्! हे हृदयानन्दन! हे क्रीड़ापरायण! आप मेरे कानोंमें कामदेवके पाशकी शोभाको धारण करनेवाले कुण्डल पहना दीजिए। मेरे इस श्रुति-मण्डलमें