गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशः सर्गः—सुप्रीत—पीताम्बरः ४०१ नेत्ररूपी हिरणकी तरङ्गका जो विकास है, प्रेक्षण-विशेषकी जो विशेष वृत्ति है, उसे भी निरस्त करनेवाले, युवकोंके मनको मोह लेनेवाले कुण्डल पहना दीजिए। इस पदसे नेत्रोंकी श्रुतिगामिता युक्त हुई है। मृगके समान बंकिमता एवं चंचलता द्योतित हुई है। भ्रमरचयं रचयन्तमुपरि रुचिरं सुचिरं मम सम्मुखे। जित-कमले विमले परिकर्मय नर्मजनकमलकं मुखे ॥ निज.... ॥४ ॥ अन्वय—[अयि नाथ] मम सम्मुखे (समक्षमवस्थाय) जितकमले (जितं सुषमा-पराजितं कमलं येन तादृशे) विमले (निर्मले) मुखे सुचिरं (बहुक्षणं व्याप्य) भ्रमरचयं (भ्रमरसमूहं) रचयन्तं (भ्रमर-पंक्तिबुद्धिं जनयन्तं) [अतएव सखीनां] नर्मजनकं (परिहासजनकं नेत्ररञ्जनमिति भावः) अलकं (चूर्णकुन्तलं) परिकर्मय (संस्कुरु विरचय इत्यर्थः) [अत्र मुखस्य कमलत्वेन, अलकस्य च भ्रमरत्वेन निरूपितम्] ॥४॥ अनुवाद—मनोहर और अमल कमलोंको भी जीतनेवाले विमल एवं रुचिर मेरे मुख पर नर्म परिहास जनक भ्रमरोंकी शोभा प्रकाशित करने वाले मेरे मुख पर आप सुन्दर अलकावलीको गूँथिए। पद्यानुवाद— अमल कमल मुख पर पिय बिखरी ये अलकें सुलझाओ, रह-रह झूम चूम उठते अलि, इनको दूर भगाओ! हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णसे कहती हैं—हे यदुनन्दन! मेरे मुखकी शोभाने कमलोंको भी जीत लिया है। आप इस मनोहर, विमल एवं अनवद्य मुख पर अलकोंसे प्रसाधन करें। मेरी अलकावली नर्म-परिहास वचनोंकी जननी है और