भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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नित्य निरन्तर पद्मोंके ऊपर घिर आयी भौरोंकी भीड़का भ्रम उत्पन्न करती है। आप ही तो मेरे मुखारविन्दके कुन्तल हैं। प्रस्तुत पदमें अलक भ्रमर पंक्ति के द्वारा मुखपद्मकी उत्प्रेक्षा की गयी है। अतः यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है। मृगमद-रस-वलितं ललितं कुरु तिलकमलिक-रजनीकरे। विहित-कलङ्क-कलं कमलानन! विश्रमित-श्रमशीकरे ॥ निज.... ॥५ ॥ अन्वय—हे कमलानन (सरोजवदन) विश्रमित-श्रम-शीकरे (विश्रामिता अपगता श्रमशीकराः श्रमाम्बुकणाः यत्र तादृशे) अलिक-रजनीकरे (अलिकं ललाटं रजनीकरः चन्द्रइव तस्मिन्) मृगमद-रसेन (कस्तूरिका-द्रवेण) वलितं (रचितं) [अतएव] विहित-कलङ्क-कलं (विहिता कृता कलङ्कस्य कला रेखा येन तादृशं ललाटस्य बालचन्द्रत्वेन मृगमदतिलकस्य च कलङ्क- कलात्वेन निरूपितं) तिलकं ललितं (सुन्दरं यथा तथा) कुरु (रचय) ॥५॥ अनुवाद—हे कमललोचन! रतिके श्रमसे उत्पन्न स्वेदबिन्दुओंसे युक्त, मृग-लाञ्छनकी शोभा धारण करनेवाले अर्द्ध-चन्द्रके समान मेरे भाल पर मनोहर कस्तूरीसे सुन्दर तिलक रचना कीजिए। पद्यानुवाद— मृगमद रससे वलित ललित अति तिलक अलिक पर मेरे, रचो, चन्द्रको, भास उठे ज्यों मृगछाया हो घेरे! हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णसे कहती हैं—हे कमलबदन! हे हृदयानन! मेरा ललाट चन्द्रमाके समान है, आप उस पर ललित मनोहर तिलक रचना कीजिए। इस तिलकको कस्तूरी—मृगमद रससे ही रचिये। जिस प्रकार अष्टमीका अर्द्धचन्द्र कलङ्क रेखाओंसे सुशोभित होता है, उसी प्रकार