गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशः सर्गः-सुप्रीत-पीताम्बरः ४०३ मेरे मुख पर भी मृगलांछनके समान मेरे विशाल भाल पर तिलक स्थापित कीजिए। रति-कालमें प्रवाहित होनेवाले श्रम-जलकण भी अब शुष्क-शान्त हो गये हैं। यहाँ इस पदसे पुनः उद्दीपन विभाव भी सूचित हो रहा है। हे कृष्ण, आप ही तो मेरे सौभाग्यके केन्द्रबिन्दु हैं, आप ही मेरे ललाटके तिलक हैं। मम रुचिरे चिकुरे कुरु मानद ! मनसिज-ध्वज-चामरे। रति-गलिते ललिते कुसुमानि शिखण्डि-शिखण्डक-डामरे ॥ निज.... ॥६॥ अन्वय-अयि मानद (सम्मानप्रद) मानसज-ध्वज-चामरे (मानसजस्य कामस्य यो ध्वजः तस्य चामरे चामरतुल्ये) रतिगलिते (सम्भौगावेगेन विकीर्णे) शिखण्डि-शिखण्डक-डामरे (शिखण्डिनो मयूरस्य शिखण्डकस्य पुच्छस्य इव डामरः आटोपो यस्य तस्मिन्; मानसजध्वजादावाटोपनादिकमपि तदुपयोग्यमेवेत्यर्थः) [अतएव] रुचिरे (स्वभाव-सुन्दरे) ललिते (मनोहरे) मम चिकुरे (कुन्तले) कुसुमानि (पुष्पमाल्यं) कुरु (विनिवेशय) ॥६॥ अनुवाद-हे मानद ! रतिकालमें शिथिल हुए कामदेवकी ध्वजाके चामरके समान तथा मयूर-पुच्छसे भी मनोहर मेरे मनोहर केशोंमें कुसुम सजा दीजिए। पद्यानुवाद- मोर पंख, चामर ध्वज मनसिजसे सुन्दर अलकोंसे, गिरे सुमन क्रीड़ामें, उनको गूँथो चुन पलकोंसे। हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन ! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन ! लगा रहे क्यों देरी ? बालबोधिनी- श्रीराधा श्रीकृष्णको इस पदमें 'मानद' शब्दसे सम्बोधित करती हैं। मानद अर्थात् मान प्रदान करनेवाले श्रीकृष्ण, अपनी प्रेयसियोंको सम्मान देनेवाले श्रीकृष्ण, 'मानद्यति' अर्थात् मानिनी रमणियोंके मानको खण्डित करनेवाले श्रीकृष्ण !