भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 436, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 436

४०४ श्रीगीतगोविन्दम् आप अपनी शोभासे मयूरोंके शिखण्डक अर्थात् मयूरपिच्छको भी तिरस्कृत करनेवाले हैं, मेरे कृष्ण-कुन्तल मनोभवके ध्वज-चमरके समान मनोहर एवं रुचिर हैं, रतिकालमें इनका बन्धन खुल गया है आप इनमें कुसुमोंको सुसज्जित कर दें। आप ही कुसुम-गुम्फित केशपाश बनकर महकें। सरस-घने जघने मम शम्बर-दारण-वारण-कन्दरे। मणि-रसना-वसनाभरणानि शुभाशय! वासय सुन्दरे॥ निज.... ॥७॥ अन्वय—अयि शुभाशय (सदाशय; शुद्धान्तःकरणस्यैव क्रियासिद्धेस्तथा सम्बोधनं प्रयुक्तम्) सरसघने (सरसं रागोद्दीपकं च तत् घनं निबिडं चेति तथोक्ते) शम्बरदारण-वारण-कन्दरे (शम्बरदारणः मदनः स एव वारणो हस्ती तस्य कन्दरे गह्बररूपे मदनावासस्थले इत्यर्थः) [स्वभावत एव] सुन्दरे मम जघने मणिरसनावसनाभरणानि (मणिमयकाञ्चीं वसनम् आभरणानि च) वासय (यथास्थानं परिधापय) ॥७॥ अनुवाद—हे शोभन-हृदय! मेरी कामदेवरूपी मदोन्मत्त हाथीकी कन्दरारूपी सरस, सुन्दर, सुभग, स्निग्ध, स्थूल जघनस्थलीको मणि, करधनी, वस्त्र तथा आभूषणोंसे अलंकृत कीजिए। पद्यानुवाद— सरस जघन घन पर मणि रसना वसनाभरण फबीले, पहनाओ सत्वर शुभ आशय! (कँपते नयन लजीले!) हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णसे कहती हैं—हे शोभन हृदय! हे हृदयानन्दन! हे प्राणनाथ! हे शुभाशय! आपके करकमल समस्त शुभोंके आशय हैं, आपका हृदय अति सरस सभी मङ्गलोंका मूल है। आप मेरी जघन-स्थली, श्रोणी-तटको मणिमय करधनी, वसन एवं आभरणोंसे अलंकृत