भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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द्वादशः सर्गः- सुप्रीत-पीताम्बरः ४०५ कर दीजिए। मेरी जघनस्थली सरस, स्निग्ध और सान्द्र है। कामदेवरूपी मदोन्मत्त हाथीके निवास हेतु कन्दराके समान सुन्दर एवं मनोहर है। आप यहाँ वस्त्र एवं आभूषण धारण कराइये। आप ही मेरे कटि तटके अलंकार हैं। प्रस्तुत पदमें अनुकूल नायक है, प्रगल्भा नायिका है तथा संभोग शृङ्गार रस है। श्रीजयदेव-वचसि रुचिरे सदयं हृदयं कुरु मण्डने। हरिचरण-स्मरणामृत-निर्मित-कलि-कलुष-ज्वर-खण्डने ॥ निज.... ॥८ ॥ अन्वय-हरिचरण-स्मरणामृत-कृत-कलि-कलुष-ज्वरखण्डने (हरिचरणयोः स्मरणमेव अमृतं तेन कृतं कलिकलुषज्वरेण यः सन्तापः तस्य खण्डनं येन तस्मिन्) जयदे (जयं श्रीकृष्णं ददातीति जयदस्तस्मिन्) मण्डने (अलङ्काररूपे) श्रीजयदेव-वचसि हृदयं (चित्तं) सदयं [यथास्यात् तथा] [भक्तिरसपूर्णं] कुरु [स्निग्धान्तःकरणस्यैव एतच्छ्रवणयोग्यत्वादिति भावः] ॥८ ॥ अनुवाद-श्रीहरिके चरणोंके स्मरणरूपी अमृतसे कलि- कलुष-ज्वरको विनष्ट करनेवाली, कल्याणदायिनी, मनोहारिणी कवि जयदेवकी वाणीको समलंकृत करनेमें अपने हृदयको सदय बनायें। पद्यानुवाद- कलिकी कलुष गरल मारक यह कवि श्रीजयदेवकी वाणी, हरि-चरणोंके स्मरणामृत-सी बनती जग कल्याणी! हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी-प्रस्तुत अष्टपदी श्रीराधा-भावकी एक सुनिश्चित योजना है। श्रीराधाके प्रेमकी चरम परिणति है कि वह स्वयंको श्रीकृष्णमें विलीन कर देना चाहती है, वह श्रीकृष्णके हाथोंसे कृष्णमय बन जाना चाहती है। उसका