गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०६ श्रीगीतगोविन्दम् हृदय श्रीकृष्णका है, उसके वस्त्र, शृङ्गार एवं आभूषण सभी तो श्रीकृष्ण हैं। इस अष्टपदीमें श्रीराधाके प्रेमकी अनुभूतिकी गहराई रस बनकर बरसी है। श्रीराधा कहती हैं-हे यदुनन्दन ! मण्डन अर्थात् शृङ्गारके निमित्त अपने हृदयको सदय बनाओ, दयापरायण होकर मण्डन बन जाओ। यह मण्डन वाणीका मण्डन जयदेवकी पत्नीके सामीप्यके कारण उत्कर्षप्रद हो गया है। इस अष्टपदीका विषय कवि जयदेवकी वाणी है। 'च' पदसे तात्पर्य है कि जैसे श्रीराधाको सुसज्जित करनेमें आप सदय बनेंगे, उसी प्रकार मेरी वाणीको भी अलंकृत करनेके लिए सदय बन जाइए। अन्य पदोंको भी जयदेवकी वाणी एवं श्रीराधाके अलंकारोंका विशेषण मानना चाहिए। यह वाणी हरि-चरणोंके स्मरणका अमृत है, जो कलिकालके कलुषित ज्वरके रोषको शान्त करनेवाला है। हरि-चरण-स्मरण-अमृत ही सभी पापोंका खण्डन करनेवाला है। यह अमृत ही कवि जयदेवकी वाणी है। इस काव्य- वर्षामृतकी स्मृति ही सबका कल्याण करनेवाली है। रचय कुचयो पत्रश्चित्रं कुरुष्व कपोलयोः घटय जघने काञ्चीं मुग्धस्रजा कबरीभरम्। कलय वलयश्रेणीं पाणौ पदे कुरुनूपूरा- विति निगदितः प्रीतः पीताम्बरोऽपि तथाकरोत् ॥१॥ अन्वय-[अयि प्राणेश्वर] [मम] कुचयोः (स्तनयोः) पत्रं (चित्रविशेषं) रचय; कपोलयोः (गण्डयोः) चित्रं कुरुष्व; जघने काञ्चीं घटय (परिधापय); स्रजा (मालया) कबरीभरं (केशपाशं) अञ्च (अलङ्कुरु); पाणौ वलयश्रेणीं कलय (विन्यस्य); पदे (चरणे) नूपुरौ कुरु (परिधापय)-इति [अत्यावेशभरेण] राधया निगदितः (अनुरुद्धः) पीताम्बरः (श्रीकृष्णः) अपि प्रीतः [सन्] तथा (श्रीराधोक्तं तत्तत् सर्वमेव) अकरोत् (सम्पादितवान्) [अपिशब्देन रतान्तर्वसन- व्यत्ययाभावेऽपि तदाज्ञाकरणात् तस्या-खण्डित-तदधीनत्वं द्रढ़ीकृतम् ॥१॥