भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ४०७ अनुवाद—हे प्राण प्रिय ! आप मेरे कुचोंपर पत्र रचना कीजिए। मेरे कपोलों पर चित्रावली रचना कीजिए, जघन-स्थलीको करधनीसे सजा दीजिए। बालोंमें मनोहर कबरी बन्धन कीजिए, हाथोंमें कंगन पहनाइए, पैरोंमें नूपुर पहना दीजिए। श्रीराधाने इस तरह जो कुछ कहा, पीताम्बरधारी श्रीकृष्णने प्रसन्न होकर वैसा ही किया। पद्यानुवाद— कुच पर पत्र, चित्र गालों पर, जघन करधनी, केशे सुमन सजाओ, राधा बोली—हे पीताम्बर वेशे। कलय-वलय कर, पद मणि नूपुर पहनाओ हे मेरे। हरि विहँसे कह—प्रिये! समर्पित हूँ चरणोंमें तेरे॥ बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोकमें कवि जयदेव इस अष्टपदीके सूत्रोंकी पुनः अवतारणा करते हुए कह रहे हैं कि पीताम्बर श्रीकृष्णको श्रीराधाके द्वारा जो कुछ भी कहा गया, उन्होंने प्रसन्न मनसे सब वैसा ही सम्पन्न किया। 'अपि' पदसे घोषित होता है कि श्रीराधाका जो-जो अभीष्ट था, श्रीकृष्णके द्वारा वैसा-वैसा शृङ्गार अत्यन्त प्रीतिपूर्वक सम्पन्न हुआ। श्रीराधाका सानुनय आग्रह है कि हे यदुनन्दन ! स्तनों पर पत्रावलीकी चित्रकारी कर दीजिए, मेरे गालों पर मकर आदि की चित्र रचना कर दीजिए। मेरी कमरमें आप करधनी पहना दीजिए, मेरे बालोंसे माला निर्माल्य हो गयी है—आप मनोहर मालासे मेरे केशोंको ग्रंथन कर दीजिए, हाथोंमें कंगन पहना दीजिए, मेरे पैरोंमें मणिमय नूपुर पहना दीजिए। श्रीकृष्ण द्वारा यह पूरा ही शृङ्गार सम्पादित किया गया—अत्यन्त प्रीति एवं आनन्दके साथ। श्रीकृष्ण ही श्रीराधाके सम्पूर्ण मण्डन बन गये। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी छंद यथा संख्या अलंकार, प्रगल्भा नायिका, दक्षिण नायक तथा शृङ्गार रसका संयोग पक्ष निरूपित हुआ है।