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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३९३ (२) कमल पुष्प-बाण—रात्रिमें सो न पानेके कारण आँखोंमें कषाय हो रहा था, आँखें लाल-लाल हो रही थीं, अतः कमल पुष्प-बाण है। (३) बन्धुजीव पुष्पबाण—श्रीराधाके अधरोंकी लालिमा प्रक्षालित हो गयी थी, अतः बन्धुजीव पुष्पबाण है। (४) मालती पुष्प-बाण—रति-क्रीड़ामें केशोंके मर्दनसे पुष्पमाला मुरझाकर निपतित हो गयी थी, अतः मालती पुष्पबाण है। (५) कुसुमास्त्रबाण—श्रीराधाकी मेखला और अञ्चल शिथिल हो गये थे, इससे कामदेवके सुवर्ण जातीय चम्पा आदि बाणोंको सूचित किया है। इन श्रीराधाके अङ्गोंमें विद्यमान पुष्पबाणोंको देखकर श्रीकृष्णका मन भी कीलित हो जाना स्वाभाविक ही था। इन बाणोंने श्रीकृष्णके नेत्रोंके माध्यमसे उनके मनको भी आहत कर दिया। प्रस्तुत श्लोकको ‘कामाद्भुताभिनवमृगाङ्क लेख’ नामक प्रबन्ध माना गया है। वही शार्दूलविक्रीड़ित छंद है और अद्भुतरसोपबृंहित शृङ्गार रस है। व्यालोलः केशपाशस्तरलितमलकैः स्वेदलोलौ कपोलौ क्लिष्टा दष्टाधरश्रीः कुचकलशरुचा हारिता हारयष्टिः। काञ्चीकाञ्चिद्गताशां स्तनजघनपदं पाणिनाच्छाद्यसद्यः पश्यन्ती सत्रपा मां तदपि विलुलित स्रग्धरेयं धिनोति ॥५ ॥ अन्वय—[यद्यपि श्रीराधायाः] केशपाशः व्यालोलः (श्लथः विकीर्ण इत्यर्थः) अलकैः (चूर्णकुन्तलैः) तरलितं (स्वस्थानात् भ्रंशितं); कपालौ (गण्डौ) स्वेदलोलौ (स्वेदेन घर्मजलेन लोलौ व्याप्तौ); दष्टाधरश्रीः (दशन-क्षताधर-शोभा), क्लिष्टा (क्षता); कुचकलस-रुचा (स्तनकुम्भयोः रुचा कान्त्या) [स्पर्द्धयेव] हारयष्टिः (मुक्ताहारः) हारिता (परिभूता); काञ्ची (मेखला)

३९४ श्रीगीतगोविन्दम् काञ्चीत् आशां (दिशं) गता; तदपि (तथापि) इयं (श्रीराधा) सद्यः (सपदि) पाणिना (करेण) स्तन-जघन-पदम् आच्छाद्य विलुलित-स्रग्धरा (विमर्दित माल्यधारिणी अपि) सत्रपं (रसावेश- शैथिल्ये निजाङ्गावलोकनात् आत्मनः क्रीड़ाविशेषावेशकलनात् सलज्जं यथा तथा) मां पश्यन्ति [सती] धिनोति (अत्युत्सुकं करोति) [वसनादिव्यतिरेकेण केवलाङ्गशोभादर्शनात् प्रीणनमिति ज्ञेयम्] ॥५॥ अनुवाद—जिनका केशपाश बिखर गया था, अलकावली चंचल हो गयी थी, कपोलयुगल स्वेदसे आर्द्र हो गये थे, अधरश्रीकी शोभा निरस्त हो गयी थी, कुच-कलशकी शोभासे मुक्ता-हारावली पराजित हो गयी थी, करधनीकी कान्ति हताश हो गयी थी; प्रातः ऐसी अवस्था पर क्लान्तश्रान्त श्रीराधा अपने हाथोंसे सद्यः वक्षोज एवं उरुद्वयको ढकने लगी, लज्जापूर्वक श्रीकृष्णको देखती हुई वह अपनी मुग्धकारिणी कान्तिसे श्रीकृष्णको आनन्दकारिणी जान पड़ रही थीं। बालबोधिनी—श्रीराधा रतिकालमें परिमर्दित होकर श्रान्त- क्लान्त हो गयी थीं। जैसे ही प्रातःकाल हुआ, वह लज्जापूर्वक जल्दी-जल्दी अपने अङ्गोंको आच्छादित करने लगीं। आच्छादित करती हुई वह श्रीकृष्णको देख रही थीं और अपनी मुग्ध-कान्तिसे श्रीकृष्णका मन मोह रही थीं। उनका कबरी-बन्धन खुल गया था, अलकावली इधर-उधर बिखर रही थी। कपोलयुगल पर स्वेद सूख जाने पर अनेक धब्बे पड़ गये थे, बिम्ब-अधरोंकी कान्ति धूमिल हो गयी थी, स्तन-कलशोंकी कान्तिके पुरःसरमें हार एवं काञ्चीकी कान्ति हताश हो गयी थी। कञ्चुकके अभावसे हारकी शोभा फीकी पड़ गयी थी और विवस्त्र होनेसे मेखलाकी कान्ति भी धूमिल हो गयी। प्रस्तुत पदमें स्रग्धरा छन्द है।

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३९५ ईषन्मीलितदृष्टि मुग्धविलसत्सीत्कारधारावशा- दव्यक्ताकुलकेलिकानुविकसदन्तांशुधौताधरम् । शान्तस्तब्धपयोधरं भृशपरिष्वङ्गात्कुरङ्गीदृशो हर्षोत्कर्षविमुक्तनिःसहतनोर्धन्यो धयत्याननम् ॥६॥ अन्वय—श्वासोन्नद्ध-पयोधरोपरि-परिष्वङ्गी (श्वासेन उन्नद्धयोः स्फीतयोः पयोधरयोः उपरि परिष्वङ्गः आलिङ्गनं विद्यते यस्य तादृशः) धन्यः (आत्मानं धन्यं मन्यमानः सौभाग्यशाली जनः) हर्षोत्कर्ष-विमुक्तिनिःसहतनोः (हर्षोत्कर्षस्य आनन्दातिशयस्य विमुक्त्या प्रसृत्या निःसहा धर्त्तुमशक्या तनुर्यस्याः तादृश्याः) कुरङ्गीदृशः (मृगलोचनायाः) [कान्तायाः] मीलद्दृष्टि (मीलन्ती सङ्कुचन्ती दृष्टिः यत्र तत् आवेशवशात् मुदितलोचनविशिष्ट- मित्यर्थः) मिलत्कपोलपुलकं (कपोल-पुलक-समन्वितं) शीत्कारधारावशात् (शीत्कारस्य या धारा अनवच्छिन्नता तस्या वशात्) अव्यक्ताकुल-केलि-काकु-विकसदन्तांशु-धौताधरं (अव्यक्ता अपरिस्फुटा आकुला असम्बन्धा या केलिषु काकुः तया विकसद्भिः दन्तांशुभिर्दन्त-प्रभाभिः धौतः अधरः यत्र तादृशं) आननं धयति (चुम्बति) ॥६॥ अनुवाद—मृगनयनी श्रीराधाकी आँखें कामकेलिजन्य आनन्दातिशयके कारण कुछ-कुछ बन्द-सी हो रही थीं, अन्य प्रकारके व्यापारको सह सकनेमें असमर्थ शरीरवाली हो गयी थीं, मुहुर्मुहुः सीत्कार करनेके कारण और अव्यक्त तथा आकुल केलि-काकु ध्वनि-विकारसे विकसित दाँतोंकी किरणोंसे उनके अधर प्रक्षालित हो गये थे, प्रगाढ़ आलिङ्गनके कारण उनके पयोधर शिथिल श्वासोच्छ्वासके कारण ईषत् कम्पित हो रहे थे—इस प्रकारके मुखमण्डलको कोई पुण्यशाली ही देख सकता है। बालबोधिनी—कवि कहते हैं कि रतिक्रीड़ामें अत्यधिक हर्षोत्कर्ष प्राप्त कर लेनेके कारण आलिंगन, चुम्बन आदिसे विमुक्त होकर श्रीराधा एक प्रकारसे परमानन्दमें डूब गयीं।

३९६ श्रीगीतगोविन्दम् कामावेशके वशीभूत उनके शरीरने अब किसी भी प्रकारके व्यापारको सह सकनेमें असमर्थता प्रकट कर दी। रतिकालमें उस मृगलोचनाके पयोधर प्रगाढ़ आलिङ्गनके कारण पुलकरहित कठिन और कुछ झुके हुए हो गये। इस प्रकार सुरतान्तमें कान्त श्रीकृष्ण उनके मुखको देखकर पुनरालिङ्गनके द्वारा अधर-पानकी स्पृहा करने लगे। नेत्र कुछ मुकुलित हो गये। विलास-क्रीड़ाके समय उनके द्वारा बार-बार मनोहर सीत्कार करनेके कारण निकलनेवाली अव्यक्त एवं आकुल काकु ध्वनि प्रस्फुटित हुई और दाँतोंकी किरणोंसे अधर-पुट धुल गये। श्रीराधाके इस प्रकारके मुखमण्डलको कोई सुकृतिवान् ही देख सकता है। यह सौभाग्य या तो श्रीकृष्णको अथवा उनकी मञ्जरियोंको ही प्राप्त हो सकता है। प्रस्तुत पदमें शार्दूलविक्रीड़ित छंद, जाति अलंकार, पाञ्चाली रीति, मागधी गीति, भारती वृत्ति और स्थित लययुक्त गान है। श्रीराधा श्रीकृष्णके बीच प्रगाढ़ आलिङ्गनको 'वृक्षाधिरूढ़कम्' आलिङ्गन कहा गया है। [अथ सा निर्गतबाधा राधा स्वाधीनभर्तृका। निजगाद रतिक्लान्तं कान्तं मण्डनवाञ्छया॥] अथ सहसा सुप्रीतं सुरतान्ते सा नितान्तखिन्नाङ्गी। राधा जगाद सादरमिदमानन्देन गोविन्दम् ॥७॥ अन्वय-[एवं प्रियदर्शनानन्दोन्मत्ता प्रियं जगादेति तस्याः स्वाधीनभर्त्तृकावस्थां वर्णयिष्यन् आह]-[स्वाधीनभर्त्तृकालक्षणं यथा-कान्तो रतिगुणाकृष्टो न जहाति यदन्तिकम्। विचित्र- विभ्रमासक्ता सा स्यात् स्वाधीनभर्त्तृका॥ इति साहित्यदर्पणे] सुरतान्ते (सुरतावसाने) नितान्तखिन्नाङ्गी (अतीवक्लान्तावयवा) सा राधा इति (उक्तप्रकारेण) मनसा निगदन्तं (कथयन्तं चिन्तयन्तमित्यर्थः) गोविन्दम् आनन्देन (आनन्दावेशेन) सादरं (यथा स्यात् तथा) इदं (वक्ष्यमाणं वचनं) जगाद (उक्तवती) ॥७॥

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३९७ अनुवाद—[इसके बाद जिसकी काम-बाधा शान्त हो गयी है, ऐसी स्वाधीनभर्तृका श्रीराधा अपने रति-श्रम-क्लान्त कान्तसे अपने शृङ्गारकी कामनासे बोलीं] तदनन्तर सुरतकालके अन्तमें अति खिन्न अंगोंवाली श्रीराधा अचानक आनन्द और आदरपूर्वक श्रीगोविन्दसे कहने लगीं। पद्यानुवाद— सरस सुरतिके अन्त, अङ्गसे छिन्न भिन्न हो बाला— हरिसे बोल उठी आँखोंमें भर कर मदकी हाला— हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! (लगा रहे क्यों देरी?) बालबोधिनी—अनन्तर दोनोंके परस्पर आनन्द एवं सन्दोहरूप सुरतके अवसान पर श्रीराधा गोविन्दको प्रोत्साहित करते हुए कहने लगीं। सम्भोगके अवसान पर श्रीराधाके अंग अतिशय रूपसे थक गये थे। श्रीराधाने अपने कान्त श्रीगोविन्दको आनन्दमय देखा और कहा। जब स्वामी प्रीतिपरायण हो तब ही अपनी बात कहना साफल्यपूर्ण होता है—यह नीति है। अतः श्रीराधा सस्मित गोविन्दसे जो कहने लगीं, उसका वर्णन इस काव्यके अगले प्रबन्धमें किया जा रहा है। गीतम् ॥२४॥ रामकरीरागयतित्तालभ्यां गीयते। कुरु यदुनन्दन! चन्दनशिशिरतरेण करेण पयोधरे। मृगमद-पत्रकमत्र मनोभवमङ्गलकलशसहोदरे ॥१॥ निजगाद सा यदुनन्दने क्रीड़ति हृदयानन्दने ॥ध्रुवपदम्॥ अन्वय—हृदयानन्दने (हृदयमानन्दयति स्वचापल्येन क्रीड़नाय उन्मुखं करोतीति हृदयानन्दनः तस्मिन् चित्ताह्लादके) यदुनन्दने

३९८ श्रीगीतगोविन्दम् (श्रीकृष्णे) क्रीड़ति (विलसति सति) [सुरतान्तेऽपि चिक्रीड़िषोदयात् अखण्डलीलात्वमुक्तम्] सा [राधा] [तं प्रति] निजगाद [क्रीड़नसमयेऽपि प्रियप्रेरणात् नित्यस्वाधीनभर्तृकत्वे प्राधान्यं द्योतितम्]।—अयि यदुनन्दन (महाकुलोद्भवत्वेन सर्वातिशायि- नामक-गुण-ख्यापनाय सम्बोधनमिदं) [यदि पुनर्मनोभव-मखारम्भः सम्भवति तदा] [चन्दनादपि] शिशिरतरेण; [शीतलत्वेन अव्यग्रतया करणयोग्यता सूचिता) [तव] करेण अत्र मनोभव-मङ्गल-कलस- सहोदरे (मनोभवस्य कामस्य यः मङ्गलकलसः तस्य सहोदरे तत्सदृशे; मङ्गलकलसोऽपि यथाविधानेन स्थाप्यते, अतस्त्वमपि तथा कुरु इत्यर्थः) [मम] पयोधरे (स्तने) मृगमद-पत्रकं (कस्तूरिका-पत्रावलीं) कुरु (रचय) ॥१॥ अनुवाद—हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले यदुनन्दनके साथ क्रीड़ा करती हुई श्रीराधाने कहा—हे यदुनन्दन! चन्दनसे भी अति शीतल अपने हाथोंसे मनोभवके मङ्गल-कलशके समान मेरे पयोधरों पर मृगमदसे पत्रक-रचना कीजिए। पद्यानुवाद— चन्दन-शिशिर समान करोंसे कुच कलशों पर मेरे, मृगमद पत्रक सुन्दर। सहचर चित्रित करो सबेरे। हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी—प्रस्तुत पदमें हृदयानन्दन ध्रुव पद है। श्रीकृष्ण श्रीराधाके हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले थे। यदुनन्दन—यदुवंशमें उत्पन्न होनेवाले नन्दनन्दन श्रीकृष्णको अपने साथ क्रीड़ा करते देखकर श्रीराधा बोलीं—मुझे अपने हाथोंसे वैसा ही सजा दो, जैसे मैं भी पूरी-की-पूरी कृष्णभावित, कृष्णमयी हूँ। सर्वप्रथम मेरे स्तन-कलशों पर चन्दनके समान शीतल स्पर्शसे कस्तूरीसे पत्रावलीकी रचना करो। मङ्गल-कलश पयपूर्ण होते हैं, सुनील आम्र-पल्लवोंसे सुसज्जित होते हैं, जिन्हें कामदेवकी विश्वयात्राके समय

द्वादशः सर्गः - सुप्रीत-पीताम्बरः ३९९ स्थापित कर दिया जाता है। इस पदसे 'मयूरपदक' नामका नख-क्षत भी व्यञ्जित हो रहा है। यहाँ कस्तूरी-पत्रक चित्रकारीका अनुनय किया जा रहा है। अलिकुल-गञ्जन-सञ्जनकं रतिनायक-शायक-मोचने। त्वदधर-चुम्बन-लम्बित-कज्जलमुज्ज्वलय प्रियलोचने॥ निज.... ॥२॥ अन्वय-अयि प्रिय (प्रीतिभाजन), रति-नायक-शायक-मोचने (रतिनायकस्य मदनस्य सायकान् बाणान् कटाक्षादिरूपान् मोचयतीति तथोक्ते; कज्जलादिकमपि तत्रापेक्षितमस्तीति भावः) [मम] लोचने (नेत्रे) अलिकुल-गञ्जन-सञ्जनकं (अलिकुल- गञ्जनं सञ्जनयति इति तादृशं भ्रमर-निकर-तिरस्कारकमित्यर्थः) त्वदधर-चुम्बन-लम्बित-कज्जलम् (तवाधरचुम्बनेन, लम्बितं गलितं कज्जलं) उज्जलय (उज्जलं कुरु; पूर्ववत् विधेहीत्यर्थः) ॥२॥ अनुवाद-हे प्रिये! रतिनायक कामदेवके सायकोंको छोड़नेवाली मेरी आँखोंका काजल तुम्हारे अधरोंके चुम्बनसे गलित हो गया है, अलि-कुलको भी तिरस्कृत करनेवाले कज्जलको मेरी आँखोंमें उज्ज्वल कीजिए। पद्यानुवाद- रति नायक सायक मोचन ये, लोचन आँजो फिर से, चुम्बन गलित हुआ काजल है, जिस पर भौंरे तरसे। हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी-हे प्रिय! हे हृदयानन्दन! श्रीराधा इस प्रकार आगे कहती हैं कि मेरी आँखोंमें नूतन कज्जल रेखाको आँजो। यह इतनी उज्ज्वल हो कि भ्रमर-समूह भी तिरस्कृत हो जायँ। मेरे ही कटाक्षपातसे कामदेवके बाण

४०० श्रीगीतगोविन्दम् चलते हैं। तुम्हारे द्वारा अधर-चुम्बन करनेसे मेरी आँखोंका काजल फैल गया है। इस पदसे श्रीकृष्णके द्वारा श्रीराधाके नेत्रोंका चुम्बन भी अभिव्यक्त हो रहा है। आप ही तो मेरी आँखोंका अञ्जन हैं। हे मनोहरवेषधारिन्! नयन-कुरङ्ग-तरङ्ग-विकास-निरासकरे श्रुतिमण्डले। मनसिज-पाश विलासधरे शुभवेश निवेशय कुण्डले ॥ निज.... ॥३॥ अन्वय—अयि शुभवेश (सुन्दर-वेशधारिन्), नयन-कुरङ्ग- तरङ्ग-विकास-निरासकरे (नयनमेव कुरङ्गः, तस्य तरङ्गः कुर्दनं तस्य या विकाशः स्फुरणं तस्य निरासं प्रत्याख्यानं करोतीति तस्मिन्) मनसिज-पाश-विलासधरे (मनसिजस्य कामस्य यः पाशः मृग-बन्धनरज्जुः तस्य विलासं शोभां धरतीति तथोक्ते) कुण्डले (सुरतभ्रष्टे इतिभावः) श्रुतिमण्डले (कर्णे) निवेशय (परिधापय)। [शुभकर्माणि कृतवेशस्य तव प्रियत्वात् ममापि तथा वेशकरणं युक्तमित्यभिप्रायः] ॥३॥ अनुवाद—हे शुभवेश ! नयनरूपी कुरङ्ग-तरङ्गके विकासको निरस्त करनेवाले तथा युवकोंके मनको बाँधनेवाले कामदेवके पाशके समान मेरे श्रुतिमण्डल पर कुण्डल धारण कराइये। पद्यानुवाद— मनसिज पाश विलास कुण्डलोंको कानोंमें धारो, हे शुभ अंग! तरंग नयन पर हरिण वृन्दको कारो। हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णसे कहती हैं—हे मनोहर- वेषधारिन्! हे प्रिय पीताम्बरधारिन्! हे हृदयानन्दन! हे क्रीड़ापरायण! आप मेरे कानोंमें कामदेवके पाशकी शोभाको धारण करनेवाले कुण्डल पहना दीजिए। मेरे इस श्रुति-मण्डलमें

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत—पीताम्बरः ४०१ नेत्ररूपी हिरणकी तरङ्गका जो विकास है, प्रेक्षण-विशेषकी जो विशेष वृत्ति है, उसे भी निरस्त करनेवाले, युवकोंके मनको मोह लेनेवाले कुण्डल पहना दीजिए। इस पदसे नेत्रोंकी श्रुतिगामिता युक्त हुई है। मृगके समान बंकिमता एवं चंचलता द्योतित हुई है। भ्रमरचयं रचयन्तमुपरि रुचिरं सुचिरं मम सम्मुखे। जित-कमले विमले परिकर्मय नर्मजनकमलकं मुखे ॥ निज.... ॥४ ॥ अन्वय—[अयि नाथ] मम सम्मुखे (समक्षमवस्थाय) जितकमले (जितं सुषमा-पराजितं कमलं येन तादृशे) विमले (निर्मले) मुखे सुचिरं (बहुक्षणं व्याप्य) भ्रमरचयं (भ्रमरसमूहं) रचयन्तं (भ्रमर-पंक्तिबुद्धिं जनयन्तं) [अतएव सखीनां] नर्मजनकं (परिहासजनकं नेत्ररञ्जनमिति भावः) अलकं (चूर्णकुन्तलं) परिकर्मय (संस्कुरु विरचय इत्यर्थः) [अत्र मुखस्य कमलत्वेन, अलकस्य च भ्रमरत्वेन निरूपितम्] ॥४॥ अनुवाद—मनोहर और अमल कमलोंको भी जीतनेवाले विमल एवं रुचिर मेरे मुख पर नर्म परिहास जनक भ्रमरोंकी शोभा प्रकाशित करने वाले मेरे मुख पर आप सुन्दर अलकावलीको गूँथिए। पद्यानुवाद— अमल कमल मुख पर पिय बिखरी ये अलकें सुलझाओ, रह-रह झूम चूम उठते अलि, इनको दूर भगाओ! हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णसे कहती हैं—हे यदुनन्दन! मेरे मुखकी शोभाने कमलोंको भी जीत लिया है। आप इस मनोहर, विमल एवं अनवद्य मुख पर अलकोंसे प्रसाधन करें। मेरी अलकावली नर्म-परिहास वचनोंकी जननी है और

नित्य निरन्तर पद्मोंके ऊपर घिर आयी भौरोंकी भीड़का भ्रम उत्पन्न करती है। आप ही तो मेरे मुखारविन्दके कुन्तल हैं। प्रस्तुत पदमें अलक भ्रमर पंक्ति के द्वारा मुखपद्मकी उत्प्रेक्षा की गयी है। अतः यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है। मृगमद-रस-वलितं ललितं कुरु तिलकमलिक-रजनीकरे। विहित-कलङ्क-कलं कमलानन! विश्रमित-श्रमशीकरे ॥ निज.... ॥५ ॥ अन्वय—हे कमलानन (सरोजवदन) विश्रमित-श्रम-शीकरे (विश्रामिता अपगता श्रमशीकराः श्रमाम्बुकणाः यत्र तादृशे) अलिक-रजनीकरे (अलिकं ललाटं रजनीकरः चन्द्रइव तस्मिन्) मृगमद-रसेन (कस्तूरिका-द्रवेण) वलितं (रचितं) [अतएव] विहित-कलङ्क-कलं (विहिता कृता कलङ्कस्य कला रेखा येन तादृशं ललाटस्य बालचन्द्रत्वेन मृगमदतिलकस्य च कलङ्क- कलात्वेन निरूपितं) तिलकं ललितं (सुन्दरं यथा तथा) कुरु (रचय) ॥५॥ अनुवाद—हे कमललोचन! रतिके श्रमसे उत्पन्न स्वेदबिन्दुओंसे युक्त, मृग-लाञ्छनकी शोभा धारण करनेवाले अर्द्ध-चन्द्रके समान मेरे भाल पर मनोहर कस्तूरीसे सुन्दर तिलक रचना कीजिए। पद्यानुवाद— मृगमद रससे वलित ललित अति तिलक अलिक पर मेरे, रचो, चन्द्रको, भास उठे ज्यों मृगछाया हो घेरे! हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णसे कहती हैं—हे कमलबदन! हे हृदयानन! मेरा ललाट चन्द्रमाके समान है, आप उस पर ललित मनोहर तिलक रचना कीजिए। इस तिलकको कस्तूरी—मृगमद रससे ही रचिये। जिस प्रकार अष्टमीका अर्द्धचन्द्र कलङ्क रेखाओंसे सुशोभित होता है, उसी प्रकार

द्वादशः सर्गः-सुप्रीत-पीताम्बरः ४०३ मेरे मुख पर भी मृगलांछनके समान मेरे विशाल भाल पर तिलक स्थापित कीजिए। रति-कालमें प्रवाहित होनेवाले श्रम-जलकण भी अब शुष्क-शान्त हो गये हैं। यहाँ इस पदसे पुनः उद्दीपन विभाव भी सूचित हो रहा है। हे कृष्ण, आप ही तो मेरे सौभाग्यके केन्द्रबिन्दु हैं, आप ही मेरे ललाटके तिलक हैं। मम रुचिरे चिकुरे कुरु मानद ! मनसिज-ध्वज-चामरे। रति-गलिते ललिते कुसुमानि शिखण्डि-शिखण्डक-डामरे ॥ निज.... ॥६॥ अन्वय-अयि मानद (सम्मानप्रद) मानसज-ध्वज-चामरे (मानसजस्य कामस्य यो ध्वजः तस्य चामरे चामरतुल्ये) रतिगलिते (सम्भौगावेगेन विकीर्णे) शिखण्डि-शिखण्डक-डामरे (शिखण्डिनो मयूरस्य शिखण्डकस्य पुच्छस्य इव डामरः आटोपो यस्य तस्मिन्; मानसजध्वजादावाटोपनादिकमपि तदुपयोग्यमेवेत्यर्थः) [अतएव] रुचिरे (स्वभाव-सुन्दरे) ललिते (मनोहरे) मम चिकुरे (कुन्तले) कुसुमानि (पुष्पमाल्यं) कुरु (विनिवेशय) ॥६॥ अनुवाद-हे मानद ! रतिकालमें शिथिल हुए कामदेवकी ध्वजाके चामरके समान तथा मयूर-पुच्छसे भी मनोहर मेरे मनोहर केशोंमें कुसुम सजा दीजिए। पद्यानुवाद- मोर पंख, चामर ध्वज मनसिजसे सुन्दर अलकोंसे, गिरे सुमन क्रीड़ामें, उनको गूँथो चुन पलकोंसे। हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन ! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन ! लगा रहे क्यों देरी ? बालबोधिनी- श्रीराधा श्रीकृष्णको इस पदमें 'मानद' शब्दसे सम्बोधित करती हैं। मानद अर्थात् मान प्रदान करनेवाले श्रीकृष्ण, अपनी प्रेयसियोंको सम्मान देनेवाले श्रीकृष्ण, 'मानद्यति' अर्थात् मानिनी रमणियोंके मानको खण्डित करनेवाले श्रीकृष्ण !

४०४ श्रीगीतगोविन्दम् आप अपनी शोभासे मयूरोंके शिखण्डक अर्थात् मयूरपिच्छको भी तिरस्कृत करनेवाले हैं, मेरे कृष्ण-कुन्तल मनोभवके ध्वज-चमरके समान मनोहर एवं रुचिर हैं, रतिकालमें इनका बन्धन खुल गया है आप इनमें कुसुमोंको सुसज्जित कर दें। आप ही कुसुम-गुम्फित केशपाश बनकर महकें। सरस-घने जघने मम शम्बर-दारण-वारण-कन्दरे। मणि-रसना-वसनाभरणानि शुभाशय! वासय सुन्दरे॥ निज.... ॥७॥ अन्वय—अयि शुभाशय (सदाशय; शुद्धान्तःकरणस्यैव क्रियासिद्धेस्तथा सम्बोधनं प्रयुक्तम्) सरसघने (सरसं रागोद्दीपकं च तत् घनं निबिडं चेति तथोक्ते) शम्बरदारण-वारण-कन्दरे (शम्बरदारणः मदनः स एव वारणो हस्ती तस्य कन्दरे गह्बररूपे मदनावासस्थले इत्यर्थः) [स्वभावत एव] सुन्दरे मम जघने मणिरसनावसनाभरणानि (मणिमयकाञ्चीं वसनम् आभरणानि च) वासय (यथास्थानं परिधापय) ॥७॥ अनुवाद—हे शोभन-हृदय! मेरी कामदेवरूपी मदोन्मत्त हाथीकी कन्दरारूपी सरस, सुन्दर, सुभग, स्निग्ध, स्थूल जघनस्थलीको मणि, करधनी, वस्त्र तथा आभूषणोंसे अलंकृत कीजिए। पद्यानुवाद— सरस जघन घन पर मणि रसना वसनाभरण फबीले, पहनाओ सत्वर शुभ आशय! (कँपते नयन लजीले!) हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णसे कहती हैं—हे शोभन हृदय! हे हृदयानन्दन! हे प्राणनाथ! हे शुभाशय! आपके करकमल समस्त शुभोंके आशय हैं, आपका हृदय अति सरस सभी मङ्गलोंका मूल है। आप मेरी जघन-स्थली, श्रोणी-तटको मणिमय करधनी, वसन एवं आभरणोंसे अलंकृत

द्वादशः सर्गः- सुप्रीत-पीताम्बरः ४०५ कर दीजिए। मेरी जघनस्थली सरस, स्निग्ध और सान्द्र है। कामदेवरूपी मदोन्मत्त हाथीके निवास हेतु कन्दराके समान सुन्दर एवं मनोहर है। आप यहाँ वस्त्र एवं आभूषण धारण कराइये। आप ही मेरे कटि तटके अलंकार हैं। प्रस्तुत पदमें अनुकूल नायक है, प्रगल्भा नायिका है तथा संभोग शृङ्गार रस है। श्रीजयदेव-वचसि रुचिरे सदयं हृदयं कुरु मण्डने। हरिचरण-स्मरणामृत-निर्मित-कलि-कलुष-ज्वर-खण्डने ॥ निज.... ॥८ ॥ अन्वय-हरिचरण-स्मरणामृत-कृत-कलि-कलुष-ज्वरखण्डने (हरिचरणयोः स्मरणमेव अमृतं तेन कृतं कलिकलुषज्वरेण यः सन्तापः तस्य खण्डनं येन तस्मिन्) जयदे (जयं श्रीकृष्णं ददातीति जयदस्तस्मिन्) मण्डने (अलङ्काररूपे) श्रीजयदेव-वचसि हृदयं (चित्तं) सदयं [यथास्यात् तथा] [भक्तिरसपूर्णं] कुरु [स्निग्धान्तःकरणस्यैव एतच्छ्रवणयोग्यत्वादिति भावः] ॥८ ॥ अनुवाद-श्रीहरिके चरणोंके स्मरणरूपी अमृतसे कलि- कलुष-ज्वरको विनष्ट करनेवाली, कल्याणदायिनी, मनोहारिणी कवि जयदेवकी वाणीको समलंकृत करनेमें अपने हृदयको सदय बनायें। पद्यानुवाद- कलिकी कलुष गरल मारक यह कवि श्रीजयदेवकी वाणी, हरि-चरणोंके स्मरणामृत-सी बनती जग कल्याणी! हे यदुनन्दन! हृदयानन्दन! इतनी अनुनय मेरी, पूर्ण करो हे असुरनिकन्दन! लगा रहे क्यों देरी? बालबोधिनी-प्रस्तुत अष्टपदी श्रीराधा-भावकी एक सुनिश्चित योजना है। श्रीराधाके प्रेमकी चरम परिणति है कि वह स्वयंको श्रीकृष्णमें विलीन कर देना चाहती है, वह श्रीकृष्णके हाथोंसे कृष्णमय बन जाना चाहती है। उसका

४०६ श्रीगीतगोविन्दम् हृदय श्रीकृष्णका है, उसके वस्त्र, शृङ्गार एवं आभूषण सभी तो श्रीकृष्ण हैं। इस अष्टपदीमें श्रीराधाके प्रेमकी अनुभूतिकी गहराई रस बनकर बरसी है। श्रीराधा कहती हैं-हे यदुनन्दन ! मण्डन अर्थात् शृङ्गारके निमित्त अपने हृदयको सदय बनाओ, दयापरायण होकर मण्डन बन जाओ। यह मण्डन वाणीका मण्डन जयदेवकी पत्नीके सामीप्यके कारण उत्कर्षप्रद हो गया है। इस अष्टपदीका विषय कवि जयदेवकी वाणी है। 'च' पदसे तात्पर्य है कि जैसे श्रीराधाको सुसज्जित करनेमें आप सदय बनेंगे, उसी प्रकार मेरी वाणीको भी अलंकृत करनेके लिए सदय बन जाइए। अन्य पदोंको भी जयदेवकी वाणी एवं श्रीराधाके अलंकारोंका विशेषण मानना चाहिए। यह वाणी हरि-चरणोंके स्मरणका अमृत है, जो कलिकालके कलुषित ज्वरके रोषको शान्त करनेवाला है। हरि-चरण-स्मरण-अमृत ही सभी पापोंका खण्डन करनेवाला है। यह अमृत ही कवि जयदेवकी वाणी है। इस काव्य- वर्षामृतकी स्मृति ही सबका कल्याण करनेवाली है। रचय कुचयो पत्रश्चित्रं कुरुष्व कपोलयोः घटय जघने काञ्चीं मुग्धस्रजा कबरीभरम्। कलय वलयश्रेणीं पाणौ पदे कुरुनूपूरा- विति निगदितः प्रीतः पीताम्बरोऽपि तथाकरोत् ॥१॥ अन्वय-[अयि प्राणेश्वर] [मम] कुचयोः (स्तनयोः) पत्रं (चित्रविशेषं) रचय; कपोलयोः (गण्डयोः) चित्रं कुरुष्व; जघने काञ्चीं घटय (परिधापय); स्रजा (मालया) कबरीभरं (केशपाशं) अञ्च (अलङ्कुरु); पाणौ वलयश्रेणीं कलय (विन्यस्य); पदे (चरणे) नूपुरौ कुरु (परिधापय)-इति [अत्यावेशभरेण] राधया निगदितः (अनुरुद्धः) पीताम्बरः (श्रीकृष्णः) अपि प्रीतः [सन्] तथा (श्रीराधोक्तं तत्तत् सर्वमेव) अकरोत् (सम्पादितवान्) [अपिशब्देन रतान्तर्वसन- व्यत्ययाभावेऽपि तदाज्ञाकरणात् तस्या-खण्डित-तदधीनत्वं द्रढ़ीकृतम् ॥१॥

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ४०७ अनुवाद—हे प्राण प्रिय ! आप मेरे कुचोंपर पत्र रचना कीजिए। मेरे कपोलों पर चित्रावली रचना कीजिए, जघन-स्थलीको करधनीसे सजा दीजिए। बालोंमें मनोहर कबरी बन्धन कीजिए, हाथोंमें कंगन पहनाइए, पैरोंमें नूपुर पहना दीजिए। श्रीराधाने इस तरह जो कुछ कहा, पीताम्बरधारी श्रीकृष्णने प्रसन्न होकर वैसा ही किया। पद्यानुवाद— कुच पर पत्र, चित्र गालों पर, जघन करधनी, केशे सुमन सजाओ, राधा बोली—हे पीताम्बर वेशे। कलय-वलय कर, पद मणि नूपुर पहनाओ हे मेरे। हरि विहँसे कह—प्रिये! समर्पित हूँ चरणोंमें तेरे॥ बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोकमें कवि जयदेव इस अष्टपदीके सूत्रोंकी पुनः अवतारणा करते हुए कह रहे हैं कि पीताम्बर श्रीकृष्णको श्रीराधाके द्वारा जो कुछ भी कहा गया, उन्होंने प्रसन्न मनसे सब वैसा ही सम्पन्न किया। 'अपि' पदसे घोषित होता है कि श्रीराधाका जो-जो अभीष्ट था, श्रीकृष्णके द्वारा वैसा-वैसा शृङ्गार अत्यन्त प्रीतिपूर्वक सम्पन्न हुआ। श्रीराधाका सानुनय आग्रह है कि हे यदुनन्दन ! स्तनों पर पत्रावलीकी चित्रकारी कर दीजिए, मेरे गालों पर मकर आदि की चित्र रचना कर दीजिए। मेरी कमरमें आप करधनी पहना दीजिए, मेरे बालोंसे माला निर्माल्य हो गयी है—आप मनोहर मालासे मेरे केशोंको ग्रंथन कर दीजिए, हाथोंमें कंगन पहना दीजिए, मेरे पैरोंमें मणिमय नूपुर पहना दीजिए। श्रीकृष्ण द्वारा यह पूरा ही शृङ्गार सम्पादित किया गया—अत्यन्त प्रीति एवं आनन्दके साथ। श्रीकृष्ण ही श्रीराधाके सम्पूर्ण मण्डन बन गये। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी छंद यथा संख्या अलंकार, प्रगल्भा नायिका, दक्षिण नायक तथा शृङ्गार रसका संयोग पक्ष निरूपित हुआ है।

४०८ श्रीगीतगोविन्दम् यद्गान्धर्व-कलासु कौशलमनुध्यानं च यद्वैष्णवं यच्छृङ्गार विवेक-तत्त्व-रचना-काव्येषु लीलायितम्। तत्सर्वं जयदेव पण्डित-कवेः कृष्णैकतानात्मनः सानन्दाः परिशोधयन्तु सुधियः श्रीगीतगोविन्दतः ॥२॥ अन्वय—[अथोपसंहारेऽपि स्वाभीष्टोपासनायाः सर्वोत्तमता निश्चयावेशेन कारुण्योदयात् तत्र सन्दिहानान् भक्तरसिकजनान् प्रत्याह]—भोः सुधियः (श्रीकृष्णभक्तिरसोल्लासितचित्ताः साधवः) [भवन्तः] सानन्दाः (आनन्देन सहिताः सन्तः) कृष्णैकतानात्मनः (कृष्णे एकतानः एकाग्रः अनन्यवृत्तिरिति यावत् आत्मा मनः यस्य तस्य; श्रीकृष्णैकान्तभक्तस्यैव सर्वगुणाश्रयत्वादित्यर्थः; यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चने इत्युक्तेः) जयदेव-पण्डितकवेः (पण्डासद-सद्विवेचिका बुद्धिः तया अन्वितः कविः सत्काव्य- कर्त्ता; जयदेव एव पण्डितकविस्तस्य) श्रीगीतगोविन्दतः (श्रीगीत- गोविन्द-ग्रन्थात्) [वक्ष्यमाणं] तत् सर्वं परिशोधयन्तु (परि सर्वतोभावेन शोधयन्तु आशङ्कापङ्कमुद्धार्य निश्चिन्वन्तु इत्यर्थः) [तत् किमित्याह]—यत् गान्धर्वकलासु (सङ्गीतशास्त्रोक्त- गीतराग- तालादिषु) कौशलं (नैपुण्यं) [तदेव निर्बन्धानुसारेण जानन्तु इत्यर्थः]; [न केवलमेतत्, अपि तु] यत् वैष्णवं (वेवेष्टि विश्वं व्याप्नोतीति विष्णुः; सर्वव्यापनशीलस्य विष्णोः अचिन्त्या- नन्तशक्तेः स्वयं भगवतः श्रीकृष्णस्य भजन-विषयकं) अनुध्यानं (अनुचिन्तनं स्वाभीष्ट-तल्लीलाविचार-समाधानात् अनुक्षण- चिन्तनमित्यर्थः) [तदपि एतद्दृष्ट्येव निश्चिन्वन्तु; नित्यत्व- सर्वोत्तमत्वनिश्चयात् द्रढ़ीकुर्वन्तु इतिभावः] यदपि शृङ्गारविवेकतत्त्वं (तत्रापि दुरूहगतेः शृङ्गारस्य-महाप्रेमरसस्य विवेके विचारे यत् तत्त्वं दुरूहातिदुरूह-व्रजलीलागतं) [तदपि निश्चिन्वन्तु]; काव्येषु यत् लीलायितं (विलसितं, रासलीलादि-व्यञ्जनाविशेष ग्रथनं) [तदपि परिशेषयन्तु एतदनुसारेण निश्चिन्वन्तु] ॥२॥ अनुवाद—जो गान्धर्व कलाओंमें कौशल हैं, श्रीकृष्णका जो ध्यान है, शृङ्गार रसका जो वास्तविक तत्त्व-विवेचन है,

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ४०९ भगवल्लीलाका जो काव्यमें वर्णन है, उन सबको भगवान् श्रीकृष्णमें एकाग्रचित्त रखनेवाले विद्वान् श्रीगीतगोविन्द नामक काव्यसे आनन्दपूर्वक परिशोधन करें। अर्थात् समझें और समझायें। बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोकमें विद्वानोंकी प्रार्थनाके व्याजसे आत्मप्रशंसा करते हैं। हे सुधी जनो ! जयदेव पण्डित कविका सर्वस्व गीतगोविन्द है। आप गीतगोविन्दको ही समझें और समझायें। गीतगोविन्दकी भी रसवत्ताकी परख करें। प्रामाणिक वस्तुकी परख आवश्यक है। गान्धर्वविद्या संगीत-शास्त्रका ही पर्याय है। अतः गान्धर्वविद्यामें जो भी विचक्षणता एवं कुशलता हो सकती है, इस काव्यमें उसे लिपिबद्ध कर दिया गया है। श्रीभगवान् सम्बन्धी वैष्णव साधनाके ध्यान-चिन्तनकी जो शुद्ध परिणति है, उसका भी निदर्शन रसमें कर दिया गया है। शृङ्गार रसका जो संयोग विप्रलम्भादिरूपसे विवेचन है, उसका भी सर्वोत्कृष्ट वर्णन इसमें किया गया है। शृङ्गाररस प्रधान काव्य प्रणयनकी जो लीला है, वह भी इसमें उत्तम रूपसे रूपायित हुई है। कवि जयदेव श्रीकृष्णमें ही अपने मन और बुद्धिको एकान्तिक रूपसे अभिनिविष्ट करनेवाले हैं। उनकी यह रचना श्रीकृष्णका एकाग्र ध्यान करनेके लिए ही है। विष्णुभक्त कला-कुशलताकी विवेकपूर्ण तत्त्व रचना की, ध्यान-चिन्तन की, लीला वर्णन की, सर्वोत्कृष्टता एवं अद्भुतताकी परिशुद्धिका स्वरूप देखना चाहें अथवा परखना चाहें तो इस महान प्रबन्ध-काव्य गीतगोविन्दके माध्यमसे करें। साध्वी माध्वीक! चिन्ता न भवति भवतः शर्करे कर्कशासि। द्राक्षे द्रक्ष्यन्ति के त्वाममृत! मृतमसि क्षीर! नीरं रसस्ते। माकन्द! क्रन्द कान्ताधर! धर न तुलां गच्छ यच्छन्ति भावं यावच्छृङ्गारसारं शुभमिव जयदेवस्य वैदग्ध्यवाचः ॥ ३ ॥

४१० श्रीगीतगोविन्दम्

अन्वय—[अथ “हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीर” इति शुकोक्तप्रायत्वात् एतच्छ्रवणकीर्त्तनस्मरणानुमोदनप्रभावमाह]—इह (मर्त्यलोके) यावत् जयदेवस्य वचांसि (पदावली) विष्वक् (सर्वतः) शृङ्गार-सारस्वतं (शृङ्गार-रस-सन्दर्भियं भावं) यच्छन्ति (ददति) तावत् हे माध्वीक (मधो) भवतः चिन्ता साध्वी न भवति (मधुरत्वेऽपि त्वयि मादकत्वादित्यर्थः); हे शर्करे त्वं कर्करा (कङ्करवत् कठिना) असि (कङ्करवत् प्रतीयसे इतिभावः; मादकत्वाभावेऽपि तव कठिनत्वादित्यर्थः); हे द्राक्षे के त्वां द्रक्ष्यन्ति (कोमलत्वेऽपि निन्द्यदेशोद्भवत्वादित्यर्थः), हे अमृत त्वं मृतम् असि (मरणान्तरं सुरलोके-प्राप्यत्वादित्यर्थः); हे क्षीर ते रसः नीरं (नीरवत्, आवर्त्तनाद्यपेक्षत्वात्), हे माकन्द (चूत) त्वं क्रन्द (रुदिहि; त्वगष्ट्यादिहेयांशसाहित्यात्); हे कान्ताधर (अतिलोभनीय-प्रियाधर), त्वं धरणितलं (पातालम् असुरालयं) गच्छ (अधोदातृनाम्त्वात् तवात्र स्थितिरपि न युक्तेत्यर्थः; श्रीजयदेव-वर्णित-मधुराख्यभक्ति-रसास्वादनिर्वृतजनास्त्वयि घृणामेव प्रदर्शयिष्यन्तीति भावः) ॥३॥ अनुवाद—अरे माध्वीक (द्राक्षासव)! तुम्हारा चिन्तन ठीक नहीं है। हे शर्करे (शक्कर)! तुम अति कर्कशा हो। हे द्राक्षे ! (अंगूर) तुम्हें कौन देखेगा। हे अमृत! तुम तो मृत तुल्य हो। हे दुग्ध! तुम्हारा स्वाद तो जलके समान है। हे माकन्द (पके आम)! तुम अब क्रन्दन करो। हे कान्ताके अधर! तुम अब पाताल चले जाओ, जब तक शृङ्गारके सार सर्वस्व शुभमय कवि जयदेवकी विदग्धतापूर्ण वाणी है, तुम्हारा कोई काम नहीं है। बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोकमें कवि जयदेवने श्रीगीतगोविन्द काव्यकी माधुर्य वैदग्धीका वर्णन किया है। सार रूपमें काव्य उज्ज्वलतम शृङ्गार रसकी मंगलमयी प्रस्तुति है, इसकी मधुरताकी ऊँचाई इतनी अनुपमेय हो गयी है कि संसारकी कोई भी मधुर वस्तु इसके सामने फीकी पड़ गई

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ४११ है। कोई भी मधुर वस्तु सुधी वैष्णवोंके लिए माधुर्यका परिवेषण नहीं कर सकती। कवि जयदेवके विदग्धतापूर्ण वचन स्वयं ही शुभ हैं, सम्पूर्ण सार-के-सार हैं, जो सार है वह शृङ्गार रस है और शृङ्गार रसका सार गीतगोविन्द है। जो कुछ भी शुभ और मंगल है वह है श्रीकृष्ण और श्रीराधाका मंगल चरित। गीतगोविन्द जैसी रस माधुर्य वैचित्री कहीं भी तो नहीं है, जिसका भगवद्भक्त रसिकजन आस्वादन कर सकें। इन शृङ्गार सार सर्वस्व वचनावलीके सामने सम्पूर्ण संसारका एकाग्रभूत माधुर्य धूमायित हो गया है। नीरस हो गया है। ग्रन्थकार कहते हैं—हे माध्वीक ! अंगूरसे बनी मदिरा ! तुम्हारी क्या चिन्ता करें, तुम्हारी मधुरता व्यर्थ है। सज्जनोंके लिए तुम्हारी मादकता किस काम की? हे शर्करे ! तुम मीठी हो तो क्या हुआ, कितनी कर्कशा हो, क्या तुम गवेषणाके योग्य हो, तुममें तो सार ही नहीं है, हे द्राक्षे ! तुम डरो मत, तुम्हारी ओर क्या कोई रसिकजन कभी देख सकता है? हे अमृत ! तुम्हें तो गर्व ही नहीं करना चाहिए, तुम तो मरे हुए ही हो, हे क्षीर रस (दूध) मैं रस हूँ, यह जानकर गर्व मत करो, क्योंकि तुम्हारा रस तो नीर ही है। हे माकन्द पके हुए रस फल, तुम्हें तो रोना ही है, रसिकजन तुम्हारा जरा भी चिन्तन नहीं करेंगे। हे कामिनीके अधर ! तुम्हारा भी कोई स्थान नहीं है, तुम तो असुरोंके निवास स्थान पातालमें चले जाओ। काव्य रसके रसिकोंको इसमें माधुर्य प्रतीत नहीं होता। प्रस्तुत श्लोकमें स्रग्धरा छंद, आरभयी वृत्ति, वैदर्भी रीति और गुणकीर्तन नामका नाट्यालङ्कार है। इस ग्रन्थके आदि मध्य और अन्तमें मङ्गल ही मङ्गल है। अतः यहाँ शुभ शब्दका उपादान है। तिरस्कृतोपदालङ्कार है।

४१२ श्रीगीतगोविन्दम् इत्थं केलिततीर्विहृत्य यमुनाकूले समं राधया तद्रोमावलि-मौक्तिकावलि-युगे वेणी भ्रमं बिभ्रति। तत्राह्लादि-कुच-प्रयागफलयोर्लिप्सावतोर्हस्तयो- र्व्यापाराः पुरुषोत्तमस्य ददतु स्फीतां मुदा सम्पदम् ॥४ ॥ अनुवाद—इस प्रकार यमुना कूलपर श्रीराधाके साथ विविध केलि क्रीड़ाओंके द्वारा विहार करके श्रीराधाकी रोमावली एवं मुक्तावली दोनों ही प्रयागके संगमका भ्रम उत्पन्न कर रहे थे। उस प्रयागके फल आह्लादकारी दोनों कुच हैं। उनको प्राप्त करनेकी इच्छावाले पुरुषोत्तम श्रीकृष्णके दोनों हस्त कमलोंमें समस्त व्यापार पाठमें और श्रोताओंको आनन्दरूप सम्पत्ति प्रदान करें। बालबोधिनी—कवि जयदेव कहते हैं कि श्रीपुरुषोत्तमके हस्त व्यापार अपने पाठकों एवं श्रोताओंको अतिशय आनन्द सम्पत्ति प्रदान करें। इन हाथोंका यह वैशिष्ट्य है कि ये नित्य-निरन्तर वेणी संगममें आनन्दित होते रहते हैं। प्रयागका फल कुच है। स्वाधीनभर्तृका श्रीराधाके साथ यमुनाके तट पर श्रीकृष्ण स्वेच्छापूर्वक अनेक प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते हैं। श्रीराधाकी रोमावली एवं मुक्तावलीका संगम गंगा-यमुना नदीके संगम विलासका स्मरण कराता है। रोमावलीकी उपमा यमुनासे की गई है; क्योंकि वह कृष्णवत् नीलवर्णा है। मुक्तावली उज्ज्वल है। अतः उसकी तुलना गंगासे की गई है। उनका संगम ही प्रयाग होता है। कुच द्वय उस प्रयाग स्नानके फल हैं, उसकी प्राप्ति ही स्नानके फलकी प्राप्ति है। नीली-नीली यमुनाकी धारा और उजली-उजली मौक्तिकावलीके संगमके कारण श्रीराधा ही प्रयाग हैं। इस प्रयागके आनन्दप्रद फलको प्राप्त करनेकी इच्छासे श्रीकृष्ण जो हस्त व्यापार कर रहे हैं, वे व्यापार समस्त पाठकोंके लिए अभिवृद्धिशील आनन्दका विधान करें। प्रस्तुत प्रबन्धका नाम 'सुप्रीतपीताम्बर तालश्रेणी' है।