गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ४०९ भगवल्लीलाका जो काव्यमें वर्णन है, उन सबको भगवान् श्रीकृष्णमें एकाग्रचित्त रखनेवाले विद्वान् श्रीगीतगोविन्द नामक काव्यसे आनन्दपूर्वक परिशोधन करें। अर्थात् समझें और समझायें। बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोकमें विद्वानोंकी प्रार्थनाके व्याजसे आत्मप्रशंसा करते हैं। हे सुधी जनो ! जयदेव पण्डित कविका सर्वस्व गीतगोविन्द है। आप गीतगोविन्दको ही समझें और समझायें। गीतगोविन्दकी भी रसवत्ताकी परख करें। प्रामाणिक वस्तुकी परख आवश्यक है। गान्धर्वविद्या संगीत-शास्त्रका ही पर्याय है। अतः गान्धर्वविद्यामें जो भी विचक्षणता एवं कुशलता हो सकती है, इस काव्यमें उसे लिपिबद्ध कर दिया गया है। श्रीभगवान् सम्बन्धी वैष्णव साधनाके ध्यान-चिन्तनकी जो शुद्ध परिणति है, उसका भी निदर्शन रसमें कर दिया गया है। शृङ्गार रसका जो संयोग विप्रलम्भादिरूपसे विवेचन है, उसका भी सर्वोत्कृष्ट वर्णन इसमें किया गया है। शृङ्गाररस प्रधान काव्य प्रणयनकी जो लीला है, वह भी इसमें उत्तम रूपसे रूपायित हुई है। कवि जयदेव श्रीकृष्णमें ही अपने मन और बुद्धिको एकान्तिक रूपसे अभिनिविष्ट करनेवाले हैं। उनकी यह रचना श्रीकृष्णका एकाग्र ध्यान करनेके लिए ही है। विष्णुभक्त कला-कुशलताकी विवेकपूर्ण तत्त्व रचना की, ध्यान-चिन्तन की, लीला वर्णन की, सर्वोत्कृष्टता एवं अद्भुतताकी परिशुद्धिका स्वरूप देखना चाहें अथवा परखना चाहें तो इस महान प्रबन्ध-काव्य गीतगोविन्दके माध्यमसे करें। साध्वी माध्वीक! चिन्ता न भवति भवतः शर्करे कर्कशासि। द्राक्षे द्रक्ष्यन्ति के त्वाममृत! मृतमसि क्षीर! नीरं रसस्ते। माकन्द! क्रन्द कान्ताधर! धर न तुलां गच्छ यच्छन्ति भावं यावच्छृङ्गारसारं शुभमिव जयदेवस्य वैदग्ध्यवाचः ॥ ३ ॥