भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 442

४१० श्रीगीतगोविन्दम्

अन्वय—[अथ “हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीर” इति शुकोक्तप्रायत्वात् एतच्छ्रवणकीर्त्तनस्मरणानुमोदनप्रभावमाह]—इह (मर्त्यलोके) यावत् जयदेवस्य वचांसि (पदावली) विष्वक् (सर्वतः) शृङ्गार-सारस्वतं (शृङ्गार-रस-सन्दर्भियं भावं) यच्छन्ति (ददति) तावत् हे माध्वीक (मधो) भवतः चिन्ता साध्वी न भवति (मधुरत्वेऽपि त्वयि मादकत्वादित्यर्थः); हे शर्करे त्वं कर्करा (कङ्करवत् कठिना) असि (कङ्करवत् प्रतीयसे इतिभावः; मादकत्वाभावेऽपि तव कठिनत्वादित्यर्थः); हे द्राक्षे के त्वां द्रक्ष्यन्ति (कोमलत्वेऽपि निन्द्यदेशोद्भवत्वादित्यर्थः), हे अमृत त्वं मृतम् असि (मरणान्तरं सुरलोके-प्राप्यत्वादित्यर्थः); हे क्षीर ते रसः नीरं (नीरवत्, आवर्त्तनाद्यपेक्षत्वात्), हे माकन्द (चूत) त्वं क्रन्द (रुदिहि; त्वगष्ट्यादिहेयांशसाहित्यात्); हे कान्ताधर (अतिलोभनीय-प्रियाधर), त्वं धरणितलं (पातालम् असुरालयं) गच्छ (अधोदातृनाम्त्वात् तवात्र स्थितिरपि न युक्तेत्यर्थः; श्रीजयदेव-वर्णित-मधुराख्यभक्ति-रसास्वादनिर्वृतजनास्त्वयि घृणामेव प्रदर्शयिष्यन्तीति भावः) ॥३॥ अनुवाद—अरे माध्वीक (द्राक्षासव)! तुम्हारा चिन्तन ठीक नहीं है। हे शर्करे (शक्कर)! तुम अति कर्कशा हो। हे द्राक्षे ! (अंगूर) तुम्हें कौन देखेगा। हे अमृत! तुम तो मृत तुल्य हो। हे दुग्ध! तुम्हारा स्वाद तो जलके समान है। हे माकन्द (पके आम)! तुम अब क्रन्दन करो। हे कान्ताके अधर! तुम अब पाताल चले जाओ, जब तक शृङ्गारके सार सर्वस्व शुभमय कवि जयदेवकी विदग्धतापूर्ण वाणी है, तुम्हारा कोई काम नहीं है। बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोकमें कवि जयदेवने श्रीगीतगोविन्द काव्यकी माधुर्य वैदग्धीका वर्णन किया है। सार रूपमें काव्य उज्ज्वलतम शृङ्गार रसकी मंगलमयी प्रस्तुति है, इसकी मधुरताकी ऊँचाई इतनी अनुपमेय हो गयी है कि संसारकी कोई भी मधुर वस्तु इसके सामने फीकी पड़ गई