भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ४११ है। कोई भी मधुर वस्तु सुधी वैष्णवोंके लिए माधुर्यका परिवेषण नहीं कर सकती। कवि जयदेवके विदग्धतापूर्ण वचन स्वयं ही शुभ हैं, सम्पूर्ण सार-के-सार हैं, जो सार है वह शृङ्गार रस है और शृङ्गार रसका सार गीतगोविन्द है। जो कुछ भी शुभ और मंगल है वह है श्रीकृष्ण और श्रीराधाका मंगल चरित। गीतगोविन्द जैसी रस माधुर्य वैचित्री कहीं भी तो नहीं है, जिसका भगवद्भक्त रसिकजन आस्वादन कर सकें। इन शृङ्गार सार सर्वस्व वचनावलीके सामने सम्पूर्ण संसारका एकाग्रभूत माधुर्य धूमायित हो गया है। नीरस हो गया है। ग्रन्थकार कहते हैं—हे माध्वीक ! अंगूरसे बनी मदिरा ! तुम्हारी क्या चिन्ता करें, तुम्हारी मधुरता व्यर्थ है। सज्जनोंके लिए तुम्हारी मादकता किस काम की? हे शर्करे ! तुम मीठी हो तो क्या हुआ, कितनी कर्कशा हो, क्या तुम गवेषणाके योग्य हो, तुममें तो सार ही नहीं है, हे द्राक्षे ! तुम डरो मत, तुम्हारी ओर क्या कोई रसिकजन कभी देख सकता है? हे अमृत ! तुम्हें तो गर्व ही नहीं करना चाहिए, तुम तो मरे हुए ही हो, हे क्षीर रस (दूध) मैं रस हूँ, यह जानकर गर्व मत करो, क्योंकि तुम्हारा रस तो नीर ही है। हे माकन्द पके हुए रस फल, तुम्हें तो रोना ही है, रसिकजन तुम्हारा जरा भी चिन्तन नहीं करेंगे। हे कामिनीके अधर ! तुम्हारा भी कोई स्थान नहीं है, तुम तो असुरोंके निवास स्थान पातालमें चले जाओ। काव्य रसके रसिकोंको इसमें माधुर्य प्रतीत नहीं होता। प्रस्तुत श्लोकमें स्रग्धरा छंद, आरभयी वृत्ति, वैदर्भी रीति और गुणकीर्तन नामका नाट्यालङ्कार है। इस ग्रन्थके आदि मध्य और अन्तमें मङ्गल ही मङ्गल है। अतः यहाँ शुभ शब्दका उपादान है। तिरस्कृतोपदालङ्कार है।