गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९० श्रीगीतगोविन्दम् दण्डित-पीड़ित किया। अपनी भुजाओंके बन्धनमें उनको बाँध लिया। पयोधरोंके भारसे उनको समस्त रूपसे दबाकर पीड़ित किया, नखोंसे उनको क्षत-विक्षत किया, दाँतोंसे उनके अधर-पुटको दंशित कर लिया, नितम्बोंसे उनको आस्फालित किया, प्रताड़ित किया, हाथोंसे बालोंको पकड़ लिया, अधरोंकी मधुधाराको पान करती हुई सम्मोहनको प्राप्त करा दिया। कितना आश्चर्य है! प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल-विक्रीड़ित छंद तथा रसवदलङ्कार है। कुछ विद्वान इसे 'कामिनीहास' नामक प्रबन्धकी भी संज्ञा देते हैं। माराङ्के रति-केलि-सङ्कुल-रणारम्भे तया साहस- प्रायं कान्तजयाय किञ्चिदुपरि प्रारम्भि यत्सम्भ्रमात्। निष्पन्दा जघनस्थली शिथिलता दोर्वल्लिरुत्कम्पितं वक्षो मीलितमक्षि पौरुषरसः स्त्रीणां कुतः सिध्यति ॥३॥ अन्वय—[तत्क्रीड़ाविशेषमाह]—माराङ्के (केलिपक्षे—मारः मदनः अङ्कः चिह्नं यत्र; रणपक्षे—मारः मारं अङ्कः चिह्नं यत्र तस्मिन्) रतिकेलिसङ्कुलरणारम्भे (रतिकेलिरेव सस्कुलरणः परस्पराहत-संग्रामः तस्य आरम्भे) तया (श्रीराधया) कान्तजयाय (कान्तस्य पराभवाय) उपरि (कान्तस्येति शेषः) साहसप्रायं (साहसबहुलं) यत्किञ्चित् (अनिर्वचनीयं) प्रारम्भि (उपक्रान्तं) तेन (वैपरीत्येन हेतुना) सम्भ्रमात् (सम्भ्रम-जनितात् आयासात् इत्यर्थः) [श्रीराधायाः] जघनस्थली निस्पन्दा [जाता], दोर्वल्लिः (भुजलता) शिथिलता (श्लथा आलस्यजड़ा इति यावत्) वक्षः उत्कम्पितं (उच्चैः कम्पितं), [तथाच] अक्षि (नेत्रयुगलं) मीलितम् (सङ्कुचितम्) [अभूत्]; [युक्तञ्चैतत्] स्त्रीणां (अवलानां) पौरुषरसः (पुरुष-सम्पाद्यव्यापारः) कुतः सिध्यति ॥३॥ अनुवाद—सुरत-क्रीड़ारूपी संग्रामके प्रारम्भ होनेपर श्रीराधाने काम-स्मर अभिनिवेशके कारण साहससे भरकर अपने कान्त पर विजय प्राप्त करनेके लिए कुछ समय तक श्रीकृष्णके