गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशः सर्गः- सुप्रीत-पीताम्बरः ३८९ श्रोणीतटेन (नितम्बदेशेन) आहतः (नितरां ताड़ितः) हस्तेन कचे (केशे) आनमितः (वक्रीकृतः) अधर-मधुस्यन्देन (अधरसुधा- क्षरणेन अधरामृतदानेनेत्यर्थः) सम्मोहितः (सम्यक् मोहं प्राप्तः) [सन्] कामपि (अनिर्वाच्यां) तृप्तिं आप (प्राप्तवान्); अहो (आश्चर्यम्) तत् (तस्मात्) कामस्य गतिः (स्वरूपं) वामा (विचित्रा)। [कान्तया संयमनादिभिः परिभूतोऽपि कान्तः कामपि अनिर्वचनीयां तृप्तिं प्राप्तस्तदतीवाद्भुतमेवेति भावः] ॥२॥ अनुवाद-राधिकाकी बाहोंसे बँधे, पयोधर-भारसे दबे, पाणिज अर्थात् नखोंसे बिद्ध किये गये, दन्तोंसे क्षत किये गये अधरवाले, कटि-तट (नितम्ब) से आहत, हाथोंसे केश पकड़कर नमित किये गये, अधर-मधु-धारासे सम्मोहित प्रिय कान्त श्रीकृष्ण किसी लोकोत्तर आनन्दको प्राप्त हुए। इस प्रकार कामदेवकी गतिको अति कुटिल कहा गया है। पद्यानुवाद- बाहु-बद्ध, कुचसे आपीड़ित। दशन-अधर क्षत, श्रोणी ताड़ित॥ कर पंकज कल कुच ध्रुव धारित। रति-गति वामा (जग अपवारित)॥ उमग रही राधा तन-मनमें। विलस रही मृदु सुमन-शयनमें॥ बालबोधिनी-प्रस्तुत पद्यमें कवि जयदेव विपरीत रतिका वर्णन करते हुए कह रहे हैं कि कान्त श्रीकृष्णने किसी वाणीसे अगोचर तृप्तिको प्राप्त किया, इसीसे कहा जाता है कि कामकी गति वाम है, लोक-पथसे अतीत है। वामत्व रसान्तरके आविर्भावसे हुआ है। मानो अपराधीको वीर रसका आश्रय लेकर क्रमसे संयमन, पीड़न, बेधन, क्षताहत, नमन और सम्मोहनकी अवस्था तक पहुँचाया है। उत्साहके स्थिर होनेपर भी काम-युद्धसे विरत नहीं होते। श्रीराधाने विपरीत रतिके माध्यमसे श्रीकृष्णको अनेक प्रकारसे